Est. 1974

बदायूँ की आवाज़

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Chapter 1 of 11

Introduction

This book was written in Hindi in 1974 and is presented here exactly as published — it is not translated. Menus and navigation switch language; the text of the book does not.

बदायूँ प्राचीन काल में

बदायूँ एक प्राचीन नगर है। यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि यह नाम इसका कब से पड़ा है। ग्यारहवीं शताब्दी के एक लेख में, जो अब लखनऊ संग्रहालय में है, इसका नाम 'बोदा मयूता' दिया हुआ है। उस समय बदायूँ पांचाल देश की राजधानी बन चुका था। इसके दूसरे नाम बुढ़मऊ, बेदामऊ भी बताये जाते हैं। पर यह ठीक नहीं कहा जा सकता कि यह नाम किस काल में पड़े। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि वैदिक व महाभारत काल में इसका नाम बेदामऊ रहा हो। बौद्ध काल में बुढ़मऊ। उसके पश्चात बोदा मयूता और बाद को जब मुसलमानों के आक्रमण शुरू हुए, इसका नाम बदायूँ पड़ गया हो।

महाभारत काल का अहीच्छत्र व उसका विभाजन :—उत्तर पांचाल व दक्षिण पांचाल

बदायूँ से लगभग १८ मील उत्तर की ओर आँवला के पास रामनगर गाँव की खुदाई १९४०-४४ में पुरातत्व विभाग की ओर से कराई गई। उससे मालूम हुआ कि महाभारत काल का अहीच्छत्र यही स्थान है। यहाँ उस समय द्रुपद राज्य करते थे और यह पांचाल राज्य के नाम से विख्यात था। बाद को पांचाल दो भागों में विभाजित कर अहीच्छत्र को उत्तर पांचाल की राजधानी बना दिया गया। अहीच्छत्र विभाजन के बाद द्रोणाचार्य के अधीन व कर्मपिल द्रुपद के अधीन पृथक्-पृथक् राज्य बन गये। उस समय समस्त पांचाल जनपद में बरेली, पीलीभीत, मुरादाबाद, रामपुर, बदायूँ, फ़र्रुख़ाबाद, एटा एवं शाहजहाँपुर ज़िले शामिल थे। उत्तर व दक्षिण पांचाल के बीच गंगा नदी बहती थी।

द्रोणाचार्य ने कौरवों व द्रुपद ने पाण्डवों का साथ दिया

महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्य ने कौरवों की ओर से और द्रुपद ने पाण्डवों की ओर से भाग लिया। युद्ध के पहले व उसके बाद भी सारा पांचाल देश सामयिक चक्र से किसी न किसी प्रकार प्रभावित होता रहा।

लाक्षाग्रह का निर्माण और उसमें सुरंग द्वारा पाण्डवों का बाहर निकलना

कहा जाता है कि पाण्डवों के रहने के वास्ते कौरवों ने लाक्षाग्रह का आयोजन किया तब वह ग्रह बदायूँ स्थित उसावाँ के समीप बारा गाँव में ही बनवाया गया था। दुर्योधन ने उसके देखने के लिए विदुर महाराज को भेजा। जब वह वहाँ पहुँचे और उन्होंने लाक्षाग्रह को देखा तब उनको दुर्योधन की कुटिल नीति का पता चला कि यह भवन पाण्डवों के नाश करने के लिए बनवाया गया है। उन्हीं आग्रह पर निर्माण करने वालों ने उसमें एक सुरंग बना दी जिसके द्वारा पाण्डव उसके बाहर निकल सकते थे। और सुरंग के मुहाने पर एक स्तम्भ स्थापित कर दिया गया, जिसको देख वे सुरंग की पहचान कर सकें। ऐसा ही हुआ। जब लाक्षाग्रह में पाण्डवों के प्रवेश करने पर उसमें आग लगा दी गई, वे तुरन्त सुरंग के द्वारा बाहर आ गये और उसावाँ की ओर बढ़ गये।

उसावाँ, प्राचीन उष्णपुरी

महाभारत काल के उसावाँ का नाम उष्णपुरी था। यहाँ का राजा बृष पर्वा के नाम से प्रसिद्ध था। पाण्डव उसावाँ में विचरते हुए लभारी ग्राम के आगे कुडरिया ग्राम में पहुँचे जो उस समय कुण्डलपुर नाम से प्रसिद्ध था।

नबीगंज का टीला राजा ययाति की राजधानी

इसी स्थान के करीब अब नबीगंज का टीला है जिस पर आजकल पाठक इन्टर कालेज की इमारत बनी हुई है। यह टीला बहुत दूर से दिखाई देता है। यह राजा ययाति की राजधानी थी जिसको महाभारत काल से भी पहले का बताया जाता है।

शुक्राचार्य ऋषि का आश्रम

इसी के समीप पटना का मन्दिर शुक्र काशी के नाम से प्रसिद्ध है, जो शुक्राचार्य ऋषि का आश्रम बताया जाता है। यह उस समय शस्त्र विद्या का केन्द्र माना जाता था।

सहसवान व सहस्त्रबाहू का किला

यह सभी स्थान बदायूँ नगर के पूरब दिशा में स्थित हैं, जो जिला शाहजहाँपुर की सीमा के निकट हैं। इधर दक्षिण पश्चिम की ओर जो अब सहसवान के नाम से प्रसिद्ध है इस स्थान पर सहस्त्रबाहू का किला बताया जाता है। सहस्त्रबाहू सकिसा के राजा थे। यह भी बड़ी प्राचीन बात है। सहसवान में ही सरसोता नाम से एक ताल है, जिसमें रंग-बिरंगी मछलियाँ तैरती हैं। इसका पानी एक भील में गिरता है। यह भील भी बड़ी पुरानी बताई जाती है। इस भील के किनारे एक बड़ा पुराना मन्दिर बना हुआ है, जिसके समीप फागुन के महीने में अब भी एक बड़ा मेला लगता है। बाद को मुसलमान काल में भी इस स्थान को काफी ख्याति मिली।

प्रख्यात नीलकंठ महादेव का मन्दिर, ईशान शिव द्वारा बनवाया जाना

बदायूँ नगर में ११७५ के करीब एक हिन्दू राजा अजयपाल ने, जो किला पहले से मौजूद था, उसकी दुरुस्ती कराई और प्रख्यात नीलकंठ महादेव के मन्दिर का पुर्ननिर्माण किया। यह मन्दिर लखनपाल के राज्य में ईशान शिव नामक मठाधीश ने बनवाया था जिसको बाद में सुल्तान अल्तमश ने नष्ट कर जामा मस्जिद बनवाई और जिसमें मन्दिर का बहुत-सा सामान लगा दिया।¹ यह मस्जिद आज भी कायम है। न सिर्फ बदायूँ की ही सबसे बड़ी इमारतों वरन् देश भर में मुसलमानों के काल की सबसे बड़ी इमारतों में से एक है। यह मस्जिद २५० फिट लम्बी व २२६ फिट चौड़ी है। ज़मीन की सतह से इसके डोम की ऊँचाई ८० फिट है। नगर के ऊँचाई के भाग पर स्थित होने के कारण यह कई मील दूर से दिखाई पड़ती है। विशेषकर पश्चिम की दिशा से। ऐसी भी कहावत है कि नीलकंठ महादेव मन्दिर की मूर्तियाँ उसके विध्वंस करने के बाद किसी कुएँ में डलवा दी गईं, जो अभी तक प्राप्त नहीं हो सकी हैं।² उसी स्थान पर और इसके चारों ओर बदायूँ का पुराना नगर बसा हुआ था जो एक किले के अन्दर था। पश्चिम की ओर से बड़ी ऊँचाई पर था। आज भी वह ऊँचाई दिखाई पड़ती है। इमारतों से ढकी हुई है। जामा मस्जिद बदायूँ की पुरानी इमारतों में एक आलीशान इमारत है।

. डि० गजेटियर पृष्ठ १६६

. डि० गजेटियर पृष्ठ १४१

लखनपुर गांव लखनपाल के नाम पर बसाया गया

बदायूँ के किले के बारे में बताया जाता है कि वह लखनपाल के राज में बनवाया गया था जिनके नाम से आज भी लखनपुर गाँव, जो नगर के पूरब में स्थित है, विख्यात है। नगर के पश्चिम, दक्षिण उत्तर दिशा में जो इमारतें बनी हैं वे सब ऊँचाई पर हैं और पुराने किले की दीवारें दिखाई पड़ती हैं।

रुहेलखण्ड में बदायूँ को सबसे पहले मुसलमानों ने अपने कब्जे में लिया

देहली पर जब मुसलमानों ने अपना शासन कायम किया, उसके थोड़े समय बाद ही उन्होंने बदायूँ को भी अपने अधीन बना लिया। रुहेलखण्ड मण्डल में यह सबसे पहला स्थान उनके कब्जे में आने वाले स्थानों में था।

मन्दिर के पीछे मदरसा

कुतुबुद्दीन ऐबक ने ११९६ में बदायूँ पर कब्जा कर एक मदरसा कायम किया जो नीलकंठ महादेव मन्दिर के पीछे रखा गया था।¹

. डि० गजे० पृष्ठ १६०

बदायूँ का इतिहास मुसलमानों के काल में

बाद में बदायूँ को सूबे का सदर मुक़ाम बनाया गया। अल्तमश ने यहाँ ईदगाह बनवाई, जो शहर के पश्चिम ओर स्थित है। अलाउद्दीन ने बदायूँ में २८ साल राज किया और अपने नाम से अलापुर गाँव को बसाया जो आज ज़िले के एक प्रमुख टाउन एरिया में से है। अकबर के शासन काल में मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूँनी मशहूर इतिहासकार बदायूँ के ही निवासी थे। उनके शासनकाल में बदायूँ में तांबे का सिक्का ढाला जाता था। यहाँ इख़लास खाँ का रौज़ा भी शहर के पूरब-उत्तर ओर एक पुरानी इमारतों में से है। इस इमारत को १८५७ के विद्रोह के बाद जेल के रूप में इस्तेमाल किया गया था और अंग्रेज़ी अफ़सरों के रहने के लिए भी। १५७२ में एक जबरदस्त आग लग जाने के कारण भारी संख्या में नगर के लोग हताहत हुए और उनकी लाशें सोत नदी में डलवाई गईं। इस आग से जामा मस्जिद को भी भारी क्षति पहुँची। उसका गुम्बद गिर गया। बाद को उसकी दुरुस्ती कुतुबउद्दीन ने करादी। "आईने अकबरी" से मालूम होता है कि उसके काल में बदायूँ सूबा का सदर मुक़ाम बना दिया गया था। जहाँगीर के राज्य काल में नवाब फ़रीदाबाद बदायूँ के गवर्नर बनाये गये थे। नज़र मोहम्मद खां ने १६३२ में सोत नदी का पुल बनवाया जो बाद को बिजली के गिर जाने के कारण नष्ट हो गया, जिसकी दुरुस्ती रुहेलों ने करवाई। १६५७ में राजा मकरन्द राय पुत्र मानिक चन्द को बरेली में गवर्नर बनाकर भेजा गया। उनके काल में बदायूँ व सम्भल कटेहर के नाम से जाने गये। औरंगज़ेब के समय सारा बदायूँ विद्रोह में उठ खड़ा हुआ जिसके बाद रोहेलों का शासन आरम्भ हो गया। रोहेलों ने आँवला पर भी अपना कब्जा कर लिया। शुजाउद्दौला स्वयं बिसौली आया और उसने पूरे रुहेलखण्ड क्षेत्र को २ करोड़ रुपये के एवज में हाफ़िज़ रहमत खाँ के दीवान वियासराय को दे दिया। इसके बाद राजा कुन्दनलाल ने १७५० तक बदायूँ को अपने अधीन रखा पर यह मालगुज़ारी पर उठाने का तरीका सफल सिद्ध नहीं हुआ क्योंकि इस इन्तज़ाम के दौरान बदायूँ के लोगों को बड़े कष्ट सहने पड़े। गाँव के गाँव उजड़ गये। लोग ग़रीब हो गये। खेती की दशा बिगड़ गई। जंगल ही जंगल नज़र आने लगे। तब १८०१ में नवाब वज़ीर ने रुहेलखण्ड के समूचे क्षेत्र को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सुपुर्द कर दिया। तब से बदायूँ कलेक्टर मुरादाबाद के अधीन बना दिया गया।

रुहेलखण्ड ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सुपुर्द व बदायूँ का उस समय शासन

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों में इन्तज़ाम आने के बाद रुहेलखण्ड कमिश्नरी का बदायूँ एक पृथक ज़िला बना दिया गया। पाँच तहसीलदार, एक ज्वाइन्ट मजिस्ट्रेट व चार अन्य डिप्टी कलेक्टरों की नियुक्ति कर दी गई। इनके अतिरिक्त आनरेरी मजिस्ट्रेटों की भी नियुक्ति की गई। एक कप्तान पुलिस एक अफ़ीम का एजेन्ट भी नियुक्त किया गया। एक सिविल सर्जन व एक असिस्टेन्ट सर्जन की भी नियुक्ति की गई। जहाँ तक दीवानी के मुक़दमों का सम्बन्ध था कितने ही इन्तज़ामात बदलने पड़े। अन्त में १८७५ में शाहजहाँपुर की जजी के अन्तर्गत बदायूँ रख दिया गया। फ़ौजदारी के मुक़दमों के वास्ते मुरादाबाद के जज के अधीन बदायूँ रखा गया। इसके साथ ही साथ हर दूसरे महीने एक एडीशनल जज मुक़दमों की सुनवाई के लिए आया करता था। अदालत मुन्सिफ़ी उभयानी सहसवान बदायूँ में कायम कर दी गई। उभयानी मुन्सिफ़ी बाद में बदायूँ में शामिल कर दी गई और बदायूँ में दो मुन्सिफ़ शर्क़ी व ग़रबी मुकरर्र कर दिये गये। इसके अतिरिक्त बिसौली में भी मुन्सिफ़ी कायम की गई।

बदायूँ १८५७ के विद्रोह के समय

१८५७ के विद्रोह के समय बदायूँ के कलेक्टर विलियम एडवर्ड्स थे। इनके अतिरिक्त तीन और अंग्रेज़ डौनेल्ड (पिता व पुत्र) बिल्सी में नील की खेती कराते थे और गिब्सन, जो कस्टम विभाग के थे। १०० फ़ौजी सिपाही ६८ एन० आई० के बरेली से बुला लिये गये थे, जो ख़ज़ाने की हिफ़ाज़त करते थे। मेरठ में उपद्रव शुरू होने की खबर बदायूँ १५ मई १८५७ को पहुँच गई। तुरन्त असन्तोप फैल गया। सबसे पहले उपद्रव बेहटा गुसाईं में प्रारम्भ हुआ, जहाँ पर कुछ गाड़ियाँ लूट ली गईं और पुलिस को मार भगाया गया। मजिस्ट्रेटों के काबू में स्थिति नहीं आई फिर आगे परगना असदपुर में आग भड़की और लूट-मार शुरू हो गई। पतरिया गाँव में २ ज़मीन्दारों को और एक को बिनावर के पास मार डाला गया।

मुसलमानों को कलेक्टर द्वारा निमंत्रित किया जाना

२५ मई १८५७ को मुसलमानों का एक त्योहार था। कलेक्टर ने इस भय से कि मुसलमान शहर में कोई उपद्रव न करें, उनको अपने यहाँ निमन्त्रित कर बुला लिया और सायंकाल तक रोके रखा और शहर में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के बारे में बातचीत करता रहा।

एटा का कलेक्टर बदायूँ में

२० मई को एटा का कलेक्टर ए० फ़िलिप्स फ़ौजी सहायता प्राप्त करने के लिए बदायूँ आया। बदायूँ के कलेक्टर से मालूम हुआ कि बरेली से कोई फ़ौजी सहायता न मिल सकेगी क्योंकि बदायूँ को भी सहायता प्राप्त नहीं हुई है।

बरेली ब्रिगेड का विद्रोह—बदायूँ में उसकी प्रतिक्रिया

१ जून को बरेली ब्रिगेड ने विद्रोह कर दिया और बदायूँ की तरफ बढ़ने लगा। इस खबर को पाकर फ़िलिप्स तुरन्त एटा को लौट गया। एडवर्ड्स बदायूँ में ही रहे। उनके पास बिल्सी से डोनेल्ड व गिब्सन भी आ गये। उसी दिन ख़ज़ाने के पहरेदारों ने विद्रोह कर ख़ज़ाना लूट लिया और जेल तोड़ दिया। उसके अन्दर के ३०० क़ैदियों को रिहा कर दिया।

बदायूँ के कलेक्टर का ज़िले के बाहर चला जाना

उसके बाद वह लोग मजिस्ट्रेट के बँगले की ओर बढ़े। इसपर एडवर्ड, डोनेल्ड एक सिख अरदली व एक अफ़गानी नौकर को साथ लेकर घोड़े पर सवार होकर बाहर निकल पड़े। वह कुछ समय के लिये शेखूपुर में शरफ़उद्दीन के मकान पर रुके। रात वहाँ बिताई। प्रात: ही दूसरे दिन वह ककोड़ा गंगा किनारे पहुँचे और नदी पार कर फ़तेहगढ़ की ओर रवाना हो गये। इसी बीच में फ़ौजी विद्रोही बरेली से बदायूँ पहुँचकर यहाँ के विद्रोह करने वालों के साथ हो गये और लूट मार करने लगे। नगला शर्क़ी के लोगों ने अदालत मुन्सिफ़ी व थाने को नष्ट कर दिया। अब सारे ज़िले में उपद्रव शुरू हो गये थे और लूट मार होने लगी थी। बिल्सी में नील के कारखाने को नष्ट कर दिया। बिसौली में अज़ीज़ खाँ ने तहसील का रुपया लूट लिया। उस समय ख़ान बहादुर खाँ ने देहली के बादशाह के अधीन अपना राज्य क़ायम कर लिया।

बदायूँ का नाज़िम अब्दुल रहमान खाँ

ख़ान बहादुर खाँ ने १७ जून को अब्दुल रहमान खाँ को बदायूँ का नाज़िम मुकर्रर किया, जिन्होंने शासन को सुव्यवस्थित करने का प्रयत्न किया। अब्दुल रहमान खाँ ने ज़मीन्दारों से मालगुज़ारी वसूल करना शुरू कर दिया पर इसमें वह नाकामियाब रहा। तभी अंग्रेज़ी की फ़ौज कर्नल विलसन के नेतृत्व में बदायूँ की ओर बढ़ी। उसने छिपे अंग्रेज़ों व ईसाइयों को निकाल कर बदायूँ से बाहर भेज दिया। अंग्रेज़ी फ़ौज रुहेला विद्रोहियों का मुक़ाबला करती रही। अन्त में ककराले के मुक़ाम पर दोनों का मुक़ाबला हो गया, जहाँ अंग्रेज़ी फ़ौज का जनरल पेनी मारा गया जिसको वहीं ककराले में दफ़ना दिया गया। पर बाद को उसकी लाश मेरठ भेज दी गई। यहाँ पर विद्रोहियों की ओर से नज़ीर खाँ मुक़ाबला कर रहा था। उसी दिन बिसौली में मेजर गारडेन से एक मुठभेड़ में विद्रोही पीछे हटा दिये गये। इस्लाम नगर में रामनरायन वकील के नेतृत्व में विद्रोहियों ने हथियार जमा कर ख़ूब आतंक जमाया पर वह रामपुर की फ़ौजों द्वारा पकड़ लिये गये और मारे गये।

बदायूँ में शान्ति व्यवस्था कायम करने के उपाय शासन की ओर से

ककराले के मोर्चे के बाद विलसन ने राजपूतों को दातागंज तहसील की देख रेख के लिए मुकर्रर किया और बदायूँ बिल्सी उभयानी में पृथक-पृथक पुलिस आफ़िसरों को तैनात कर दिया। इसी प्रकार परगना सहसवान, कोट, बिसौली में भी आफ़िसर्स को मुकर्रर किया। शेखूपुर के शेख शरफ़ुद्दीन को बदायूँ का तहसीलदार बनाया। कार्मेकल, जो उस समय बरेली में थे, उन्होंने बदायूँ में कलेक्टरी का चार्ज ले लिया और राजपूत ज़मींदारों की सहायता द्वारा इन्तज़ाम किया। तीसरी जून को ब्रिगेडियर का फ़ौजी दस्ता शाहजहाँपुर से उसहत की तरफ आया। रास्ते में तीन गाँवों को आग लगा दी और ६ जून को बदायूँ पहुँचा। बदायूँ में कितने ही लोगों को गिरफ़्तार किया। इसके दो दिन बाद कलेक्टर एक फ़ौजी दस्ते के साथ पहुँच गया, जिसकी कमान कर्नल विलकिन्सन कर रहे थे। यह दोनों दस्ते अलग अलग रास्तों से मुरादाबाद की ओर चले गये। रास्ते में दो गाँव जला दिये और अनेक विद्रोहियों को सहसवान में गिरफ़्तार किया गया। वहाँ से वे इस्लामनगर पहुँचे, जहाँ पर विद्रोहियों को फाँसियाँ दी गईं। इसके बाद कलेक्टर ने गुन्नौर और सहसवान इलाके का दौरा किया। इसके बाद अगस्त के मास तक शांति स्थापित हो गई और मालगुज़ारी वसूल होना शुरू हो गई।

इनामों की तक़सीम

जब स्थिति काबू में आ गई उसके पश्चात् उन लोगों को इनामात दिये गये जिन्होंने या तो भागने वालों की जानें बचाई थीं या शान्ति स्थापित करने और सुव्यवस्थित शासन को फिर से लाने में मदद की थी। विद्रोह का असर समूचे ज़िले पर पड़ा था।

सहसवान ज़िले का सदर मुक़ाम, पाँच तहसीलों में बदायूँ का विभाजन

यद्यपि बदायूँ अँग्रेज़ों के शासन में १८०१ से ही आ गया था पर १८२३ में एक पृथक ज़िले के रूप में सहसवान को सदर मुक़ाम मान कर बनाया गया। १८५५ में सहसवान के स्थान पर बदायूँ को सदर मुक़ाम बनाया गया। तब बदायूँ को ५ तहसीलों में बांट दिया गया। बदायूँ, बिसौली, सहसवान, दातागंज व गुन्नौर। उस समय जो सबसे ज़्यादा बोली बोलता था उसी को पृथक पृथक क्षेत्र किसान से लगान वसूल करने के लिए दे दिया जाता था। कोई बन्दोबस्त नहीं कराया जाता था। सबसे प्रथम बार १८०३ में तीन साल के वास्ते बन्दोबस्त कराया था। वह बन्दोबस्त भी सरसरी तौर पर ही कराया गया था। उस समय की अधिक से अधिक बोली बोलने वालों को ही क्षेत्र दे दिये जाते थे। यह काम तहसीलदारों द्वारा कराया जाता था, जिनको कोई तनख़्वाह नहीं दी जाती थी। केवल वसूली पर १० फ़ीसदी कमीशन दिया जाता था। बाद को यह सारा काम तहसीलदारों से निकाल कर बोर्ड आफ़ रेवन्यू के सुपुर्द कर दिया गया। १८३४-१८३७ में दोबारा बन्दोबस्त कराया गया। उसके बाद १८६४-१८७० में, जिनके द्वारा गवर्नमेन्ट की मालगुज़ारी निर्धारित की जाती थी। १८७१ के बाद से मालगुज़ारी के अलावा अब गाँव की वसूली भी शुरू कर दी गई।

बदायूँ में पुलिस स्टेशन

उस समय बदायूँ में १३ पुलिस स्टेशन कायम किये गये। बाद में संख्या १६ कर दी गई। इस समय १८ पुलिस स्टेशन ज़िला बदायूँ में हैं। वह इस प्रकार है :—बदायूँ, बिनावर, उभयानी, कादरचौक। बिसौली तहसील में—बिसौली, वज़ीरगंज, इस्लामनगर। गुन्नौर तहसील में—गुन्नौर, रजपुरा। सहसवान तहसील में—सहसवान, बिल्सी, उगैती, जरीफनगर। दातागंज तहसील में—दातागंज, उसहत, अलापुर, हज़रतपुर व मूसा भाग।

बदायूँ में जेल की स्थापना

बदायूँ में जेल १८४० में क़ायम की गई जो आगे चलकर नाकाफ़ी सिद्ध हुई। १८५७ के विद्रोह में यह जेल नष्ट कर दी गई थी, जिसको विद्रोह के शान्त होने के बाद फिर से बनवाया गया था और उसमें समय समय पर विस्तार होता गया। यह जेल बदायूँ कलेक्ट्रेट की इमारत के पास है।

शराब की भट्टियों की स्थापना

शराब बनाने की भट्टियाँ इस तहसील में १८६३ में क़ायम कर दी गईं और फ़ी गैलन शराब पर ड्यूटी लगा दी गई। अफ़ीम की काश्त पर अलग ड्यूटी लगाई गई। उस समय रजिस्ट्री के लिए बदायूँ को मुरादाबाद ज़िले के अधीन रख दिया गया यद्यपि पाँचों तहसीलों में रजिस्ट्री के दफ़्तर क़ायम कर दिये गये हैं। इन्कम टैक्स सबसे प्रथम बार एक्ट ३२ आफ़ १८६० के अनुसार वसूल किया गया। २०० रुपये या उससे अधिक आमदनी के ऊपर यह टैक्स लगाया जाता था। एक्ट १४ आफ़ १८६६ के अनुसार डाक विभाग ज़िले में लागू किया गया और १८७७ तक पोस्ट आफ़िसों की संख्या १८ कर दी गई। यह संख्या १९०६ में बढ़कर ३२ हो गई।

तार व टेलीफोन का सम्बन्ध

तार की लाइन पहले बरेली और बदायूँ के बीच खींची गई थी। अब बदायूँ का हर तहसील हेड क़वार्टर से तार का संबंध हो गया है। इसके साथ ही टेलीफ़ोन का संबंध स्थापित हो गया है।

म्युनिस्पिलिटयों की स्थापना व डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का गठन

बदायूँ व बिल्सी में १८६२ में म्युनिस्पल्टी स्थापित हुई। उभयानी में १८६६ में और १८७२ में सहसवान में। उत्तर प्रदेश के ऐक्ट १९०६ के अनुसार बदायूँ में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की स्थापना की गई। यद्यपि १८७१ के बाद से ही एक कमेटी काम कर रही थी। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के मेम्बर कलेक्टर बनाये गये। इनके अतिरिक्त २० सदस्य रखे गये। सबसे महत्वपूर्ण विभाग डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अधीन शिक्षा का रखा गया। १८५४ में सबसे प्रथम एंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल की स्थापना बदायूँ में हुई।

अस्पताल की बदायूँ में स्थापना

इसी प्रकार सबसे प्रथम अस्पताल बदायूँ में १८४६ में क़ायम किया गया जो ज़िले के रहने वालों से चन्दा जमा करके बनवाया गया। बाद में यह अस्पताल गवर्नमेन्ट ने अपने हाथ में ले लिया। उसके बाद गुन्नौर, बिसौली, दातागंज में भी अस्पताल खुलवाये। इस समय अस्पताल सहसवान में भी है। और संख्या में भी वृद्धि हुई है।

ज़िले की आबादी

आबादी के लिहाज़ से ज़िले में सबसे अधिक संख्या में अहिर बसते हैं जिनमें अहीर भी शामिल हैं। विशेषकर वह गुन्नौर व सहसवान तहसील में आबाद हैं। अहिरों के बाद जनसंख्या में जाटव आते हैं। यह बदायूँ, बिसौली व दातागंज तहसील में आबाद हैं। इनके बाद संख्या के ख्याल से मुराव आते हैं। यह बदायूँ दातागंज व बिसौली में आबाद हैं। संख्या के ख्याल से इनके बाद राजपूत आते हैं। यह अधिकतर दातागंज व बिसौली में आबाद हैं। ब्राह्मणों की संख्या इन सब के बाद आती है और उनके बाद वैश्य, जो सारे ज़िले में व्यापार के कामों में लगे हुए हैं। किसान व गड़रिये भी काफी आबाद हैं। नाई, धोबी, कहार, भंगी, तेली, कोरी, कुर्मी, पासी भी बसते हैं। कायस्थों की भी संख्या काफी है। यह पहले अधिकांश जमींदारी का पेशा करते थे। बदायूँ में कायस्थ सक्सेना अधिक संख्या में हैं। दूसरे कायस्थ वर्ग के लोग कम रहते हैं। कुर्मियों में भी पहले अधिकतर ज़मींदार पेशा थे।

बदायूँ में मुसलमान

ज़िले में मुसलमानों में सुन्नी मत के मानने वाले अधिकांश रहते हैं, शिया मत के बहुत कम। मुसलमानों में शेख, पठान अन्सारी रहते हैं, मुसलमानों में अधिकांश ज़मींदारी पेशा करते थे।

खेतिहरों की संख्या

ज़िले में ६८.८ प्रतिशत लोग खेती का पेशा करते हैं। कपड़ा बुनने वालों की संख्या अब बहुत कम हो गई है।

ज़िले की भाषा

सारे ज़िले की भाषा पश्चिमी हिन्दी है। जो उर्दू व हिन्दुस्तानी से मिलती जुलती है। शहर व क़स्बों के लोग अधिकांश हिन्दुस्तानी भाषा बोलते हैं। देहातों में ब्रज भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।

ज़मींदारी प्रथा के दूर हो जाने से अब काश्तकारों की संख्या बढ़ गई है। जो पहले ज़मींदारी पर निर्भर रहते थे अब स्वयं खेती करने लगे हैं और उसी से अब अपना निर्वाह करते हैं :—

बदायूँ की जनसंख्या

बदायूँ जिले की कुल जनसंख्या व म्युनिसिपल्टी बदायूँ की जनसंख्या इस प्रकार है :—

वर्षज़िले की जन संख्याम्युनिसिपल्टी की जनसंख्या
१८५१ में१२,५१,१५२५३,५२१
१८६१ में१४,११,६५७५८,७७०
१८७१ में१६,४४,६४२७२,१०६

बदायूँ सबसे पिछड़ा हुआ ज़िला — प्रदेश में

बदायूँ उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े हुए ज़िलों में से एक है। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में केवल एक अँग्रेज़ी हाई स्कूल शहर बदायूँ में था जो बीचों बीच शहर की सरकारी इमारत में चलता था। अब इसी इमारत में लड़कों का नार्मल स्कूल चल रहा है। गवर्नमेन्ट हाई स्कूल अब इन्टर कालेज बन गया है। इसके लिए नई इमारत शहर के बाहर पुलिस परेड ग्राउन्ड के पश्चिम की ओर बनाई गई है जिसमें और भी विस्तार किया जा रहा है।

कलेक्ट्री की इमारत पुरानी है

कलेक्ट्री की इमारत बहुत पुरानी बनी हुई है, जिसमें कलेक्टर के अलावा पाँच हाकिम परगना अपने अपने इजलास करते हैं। पहले इसी इमारत में आनरेरी मजिस्ट्रेट भी अपनी कचहरी करते थे। अब उनके स्थान पर रेवेन्यू आफ़िसर बैठा करते हैं। पहले यहाँ दो मुन्सिफ़ भी कचहरी करते थे। अब मुन्सिफ़ नये सिविल कोर्ट की बिल्डिंग में बैठते हैं।

बदायूँ में जजी १८१३ में क़ायम हुई

१८१३ में शाहजहाँपुर से बदल कर जजी बदायूँ आ गई। इसके लिए नई इमारत तैयार की गई, जिसमें काफी विस्तार हो चुका है। अब इस इमारत में डिस्ट्रिक्ट जज, सिविल जज, अनेक सिविल एण्ड सेशन जज व अनेक मुन्सिफ़ साहबान अपने अपने इजलास करते हैं। बदायूँ में शाहजहाँपुर से जजी आने के समय जो बदायूँ ज़िले के वकील वहाँ काम करते थे वह भी बदायूँ आ गये और अपनी वकालतें शुरू कर दीं। उनमें दो नामी वकील मौलवी रज़ीउद्दीन व बाबू रामकुमार भी आ गये और आते ही अपनी धाक जमा दी।

बदायूँ में रेलवे लाइन १९०६ ई० में

१९०६ में मीटर गेज की बरेली से कासगंज जाने वाली छोटी लाइन डाली गई। इसके पहले बदायूँ के रहने वालों को आँवला, जो बदायूँ से १८ मील दूर पक्की सड़क पर है और जहाँ बड़ी लाइन की रेलगाड़ी बरेली से अलीगढ़ को जाती है, बदायूँ से बाहर सफ़र करने वालों को वहाँ जाना पड़ता था। बरेली व बदायूँ के बीच में राम गंगा व बदायूँ और कासगंज के बीच बड़ी गंगा बहती है जिनके कारण जब रेलगाड़ी नहीं थी, बदायूँ से बाहर जाना बहुत कठिन हो जाता था।

बदायूँ में बड़ी लाइन की योजना

प्रथम विश्वयुद्ध के पहले ब्रिटिश सरकार की ओर से एक योजना बनाई गई थी जिसके अनुसार रौज़ा (शाहजहाँपुर) से, जो बड़ी लाइन (ब्राड गेज) पर बरेली व लखनऊ के बीच पड़ता है, बदायूँ को जोड़ने का विचार था कि यह लाइन बदायूँ व सहसवान तहसीलों में से होकर गुन्नौर में बघराला स्टेशन से जाकर मिले जहाँ बड़ी लाइन पहले से ही मौजूद है। इसकी पैमाइश भी हो गई थी पर विश्व युद्ध प्रारम्भ हो जाने के कारण यह योजना स्थगित कर दी गई। यह बड़ी ही उपयोगी योजना थी और यदि लाइन उस समय पड़ जाती तो ज़िले का पिछड़ापन काफी हद तक दूर हो जाता। एक तरफ लखनऊ दूसरी तरफ देहली से सीधा सम्बन्ध बदायूँ का हो जाता। पर ऐसा नहीं हुआ। इसी प्रश्न को लेकर रघुवीर सहाय ने, जो पार्लियामेंट के सदस्य १९५२-६२ तक रहे, अनेक बार केन्द्रीय सरकार का ध्यान दिलाया पर कोई नतीजा नहीं निकला।

अँग्रेज़ी शासन का ढांचा

अँग्रेज़ी शासन काल में बदायूँ में कलेक्टर, कप्तान पुलिस, डि० जज प्रायः अँग्रेज़ ही हुआ करते थे। ज्वाइन्ट मजिस्ट्रेट आई० सी० एस० हुआ करता था। डिप्टी कलेक्टर अधिकांश मुसलमान ही भेजे जाते थे। हुकूमत की ओर से बदायूँ का हाकिम परगना, जो सिटी मजिस्ट्रेट भी होता था, तहसीलदार, सिटी कोतवाल मुसलमान ही नियुक्त किये जाते थे। बदायूँ म्युनिसिपल्टी क चेयरमैन भी प्रायः मुसलमान ही हुआ करता था।

गोरों की पलटन का बदायूँ से होकर गुज़रना

उस समय कभी कभी गोरों की पलटन कासगंज से बरेली की ओर व बरेली से कासगंज की ओर जाती हुई शहर के अन्दर से गुज़रा करती थी तो शहर के लोग अपने अपने दरवाज़ों पर खड़े होकर उसको देखा करते थे। समय समय पर स्थानीय पुलिस फोर्स शहर में गश्त करने के लिए निकला करती थी। अँग्रेज़ की शक्ल से भय उत्पन्न होता था। केवल उनके रोब दाब दबदबे से ही हुकूमत चलती थी। अँग्रेज़ी पढ़े लिखे लोग अँग्रेज़ी भाषा बोलने में अभिमान करते थे।

बदायूँ में आर्य समाज की स्थापना व महर्षि स्वामी दयानन्द का आगमन व दयानन्द आश्रम का निर्माण

आर्य समाज बदायूँ की बड़ी पुरानी संस्था है। स्वामी दयानन्द सरस्वती यहाँ ३१ जुलाई १८७९ को पधारे थे और लगभग १५ दिन सागर ताल के निकट गंगा राम के बाग़ में धर्मशाला में ठहरे थे। शहर के बहुत से हिन्दू, मुसलमान, ईसाई उनको देखने गये थे और बड़े प्रभावित हुए थे। उनके यहाँ से चले जाने के बाद ही आर्य समाज की स्थापना कर दी गई। पहले आर्य समाज मुहल्ला कूचा पाण्डा में एक छोटे से मकान में अपना कार्य करता था। बाद को १८३४ में इसके लिए एक विशाल भवन का निर्माण पुरानी कोतवाली के पास स्वर्गीय बाबू जय नारायन रिटायर्ड पोस्ट मास्टर द्वारा किया गया जो अब दयानन्द सेवा आश्रम आर्य समाज बदायूँ के नाम से प्रसिद्ध है। इस भवन निर्माण में लगभग पचास हज़ार रुपया व्यय हुआ और उत्तर प्रदेश के आर्य समाजों में सबसे श्रेष्ठ इमारत बताई जाती है। यह भवन अब सार्वदेशिक सभा को समर्पित कर दिया गया है। श्री जय नारायन जी ने सोत नदी के किनारे एक शमशान का भी निर्माण कराया है। आर्य समाज भवन में बुद्धदेव पुस्तकालय भी चल रहा है जिसमें हर प्रकार की पुस्तकों को इकट्ठा किया गया है। बाद को श्री जय नारायन ने सन्यास ले लिया और तब उनका नाम स्वामी विभानन्द रख दिया गया।

अब इस विशाल भवन की देखभाल श्री जय नारायण के भाई श्री रामचन्द्र कर रहे हैं।

बदायूँ में गुरुकुल सूर्य कुण्ड

यह गुरुकुल स्वामी दर्शनानन्द ने बदायूँ शहर से पूरब की ओर लगभग २ मील दूर एक बहुत पुरानी भाड़ी व उसके ही निकट सूर्य कुण्ड ताल के पास १९०३ में स्थापित किया। इसमें वेद व शास्त्र की शिक्षा देने का प्रबन्ध किया गया था। भाड़ी व सूर्य कुण्ड इस समय भी है। यद्यपि गुरुकुल में अब परीक्षाओं का वही क्रम है जो दूसरे विद्यालयों में रखा जाना है। गुरुकुल के वार्षिक अधिवेशन भी हुआ करते हैं जिनमें भाग लेने बाहर से विख्यात पंडित, साधू, सन्यासी आते हैं।

बदायूँ की ज़ियारत

सोत नदी के पार पश्चिम की ओर बदायूँ की नई ज़ियारत है। जिसमें हर साल उर्स किये जाते हैं, उनमें शरीक होने के लिए दूर-दूर से मुसलमान आते हैं। ज़ियारत पर बीमार लोग अपनी-अपनी बीमारियों को दूर करने के लिए भी आते हैं जिसमें हिन्दू व मुसलमान दोनों ही शामिल हैं। ये लोग आसपास की भाड़ियों में ठहर कर अपना समय बिताते हैं।

शहर का घंटाघर

शहर के बीचो बीच पुराने हाई स्कूल की इमारत के पास घंटाघर बना हुआ है। इसको यहाँ के मशहूर टोंक वालों के घराने के मौलवी ज़हूर हुसैन ने बनवाया था। घन्टाघर के नीचे तीन तरफ दुकानें बनी हुई हैं।

नवाब नौबतराय का मन्दिर

मुहल्ला क़ानूनगोयान में, जिसमें अधिकांश कायस्थ रहते हैं, नवाब नौबत राय ने, जो अवध के नवाबों के ज़माने में ऊँचे ओहदे पर थे, बदायूँ वापस आकर १८७६ में एक मन्दिर तामीर कराया जो अब चित्रगुप्त सभा के अधीन है और जिसमें चित्रगुप्त जी महाराज की मूर्ति भी विद्यमान है। इस मन्दिर में प्रायः संगमरमर के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। फ़र्श सब संगमरमर के हैं और संगमरमर की मूर्तियाँ व सिंहासन बने हैं जो सब अति सुन्दर हैं। इस मन्दिर की देख-रेख नवाब नौबतराय के बाद उनके पुत्र श्री रघुराज सिंह करते रहे। अब उनके पुत्र ब्रजराजसिंह कर रहे हैं।

मुहल्ला टिकैटगंज

एक दूसरे अवध के नवाबों के ज़माने के मुं० टिकैतराय ने अपने नाम से टिकैत-गंज मुहल्ला बसाया है जो अब भी शहर के मुहल्लों में प्रमुख मुहल्ला है।

बदायूँ में चर्च की स्थापना

१५७२ में एक चर्च की स्थापना बदायूँ में की गई जो इमारत अब भी मौजूद है। पुलिस परेड ग्राउण्ड के पूरब की ओर बनी हुई है। अमेरिकन मिशन भी यहाँ की एक पुरानी संस्थाओं में से है। इसकी देख रेख के लिए पहले अंग्रेज़ व अमेरिकन मिशनरी यहाँ रखे जाते थे। पर अब सब प्रबन्ध देशी क्रिश्चियनों के द्वारा किया जाता है। एक हाई स्कूल शहर के बीच में तहसील के सामने उनकी ओर से चलाया जाता है। दूसरा सिंगलर गर्ल्स हाई स्कूल सिविल लाइन्स में अमेरिकन मिशन कम्पाउण्ड में एक बड़ी इमारत में चलाया जा रहा है। इसको देखने महात्मा गांधी सन् १९२९ में गये थे। यहाँ क्रिश्चियन्स की एक कालोनी है और स्थान-स्थान पर उनके गिरजा घर बने हुए हैं।

बदायूँ में कम्पनी बाग़

शहर के पूरब की ओर रेलवे स्टेशन जाने वाले दोनों रास्तों के बीच एक बड़े लम्बे चौड़े मैदान में कम्पनी बाग़ (विक्टोरिया पार्क) के नाम से था। इसी में महारानी विक्टोरिया की एक मूर्ति १९०६ में स्थापित की गई थी, जो अब वहाँ से हटा कर लखनऊ म्युज़ियम को भेज दी गई है। इसमें ही एक तरफ को एक क्लब एलन क्लब के नाम से चलाया जाता था, जिसमें अंग्रेज़ अधिकारी, वकील व रईस लोग आकर टेनिस इत्यादि खेलते थे। अब भी यह क्लब चल रहा है। पर अब इसका नाम बदायूँ क्लब है। अब यह लम्बा-चौड़ा मैदान पार्क के रूप में नहीं रहा है। उत्तर की ओर एक बड़े क्षेत्र में श्री कृण इन्टर कालेज की इमारत बन गई है पश्चिम की ओर वाटर वक्सं लग गये हैं और उसी दिशा में आँखों के अस्पताल की इमारत बनाई जा रही है। अब इस मैदान की देख-रेख बदायूँ म्युनिस्पिल्टी ही कर रही है।

बदायूँ में बिजली की रोशनी

बदायूँ में पहले बिजली की रोशनी नहीं थी। मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेनों द्वारा शहर की रोशनी का प्रबन्ध म्युनिस्पिल्टी के ज़रिये किया जाता था। मकानों में भी इसकी रोशनी होती थी। १८३३ में प्रथम बार बिजली की रोशनी लगाई गई। अब समूचे शहर व सिविल लाइन्स में बिजली की रोशनी का प्रबन्ध हो गया है।

मोहर्रम व दशहरे के त्योहार

बदायूँ में मोहर्रम बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। ताज़िया व अलम के जुलूस बड़ी शान से निकाले जाते थे, जिनके देखने के लिए दर्शकों की भीड़ बेशुमार होती थी। मुसलमानों के अलावा हिन्दू भी उनमें भाग लेते थे। इसी तरह दशहरा का त्योहार भी शहर के बाहर पूरबी ओर एक बाग़ में मनाया जाता था, जिसमें गाँव के लोग अधिक संख्या में भाग लेने आते थे। अब दशहरा शहर के बीच गांधी ग्राउन्ड में मनाया जाता है। गांधी ग्राउन्ड में ही गांधी जी की प्रतिमा श्री पुरषोत्तम लाल भदवार उभानी द्वारा लगी हुई है। इसी गांधी ग्राउन्ड में गांधी स्मारक के भी निर्माण का आयोजन किया जा रहा है।

बदायूँ के विख्यात पुरुष

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से जब से, बदायूँ में रेल आई, शाहजहाँपुर से जजी लाई गई, बिजली की रोशनी लगी तब से शिक्षा के प्रसार में भी तरक्की हुई। हर दिशा में यहाँ लोगों ने प्रगति करने के प्रयास किये। यहाँ के ख्याति प्राप्त किये हुए व्यक्तियों में से कुछ के नाम दिये जाते हैं :—

वकीलों में :—मौलवी रज़ीउद्दीन, बाबू राजकुमार, बाबू श्यामाचरन, मौलवी इकराम आलम।

डाक्टरों में :—डाक्टर राम चरनलाल, डाक्टर लक्ष्मी नारायन रायज़ादा।

शायरों में :—मुन्शी बाँके लाल जार, मो० शौकत अली खाँ फ़ानी, शकील बदायूँनी और लक्ष्मी नारायन जौहर।

हकीम वैद्य :—हकीम सिराज अहमद, हकीम जगन्नाथ, हकीम श्याम लाल, हकीम मोहम्मद ज़ुबैर, पं० रामनरायन वैद्य, हकीम पालकी, हकीम भोलानाथ।

पत्रकारों में :—मिस्टर निज़ामउद्दीन हुसैन निज़ामी, सम्पादक 'ज़ुलक़रनैन'।

समाचार पत्रों का अभाव

उन दिनों समाचार पत्रों के पढ़ने का रिवाज नहीं था जैसा कि अब हो गया है। गिने चुने अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे लोग इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले 'लीडर' को पढ़ा करते थे। बाबू कृष्ण मुरारी वकील ने लीडर को उसके प्रकाशन की तारीख़ से ही मंगाना शुरू कर दिया था और मृत्यु पर्यन्त उसी अखबार को पढ़ते रहे। 'पाइनियर' भी उन दिनों इलाहाबाद से ही प्रकाशित होता था। उसको अंग्रेज़ व हिन्दुस्तानी उच्च अधिकारी पढ़ा करते थे।

राजनैतिक विचारों का प्रभाव

हिन्दी या उर्दू का कोई दैनिक उन दिनों बदायूँ नहीं पहुँचता था। एक स्थानीय पत्र 'ज़ुलक़रनैन' उर्दू भाषा में प्रकाशित होता था। लोग उसको बड़ी दिलचस्पी से पढ़ते थे। उस समय बाहर के समाचार पत्र डाक द्वारा मंगाये जाते थे, एजेन्टों द्वारा नहीं जैसी अब प्रथा चल रही हैं। राजनैतिक विचारों का एक प्रकार से अभाव था।

लखनऊ में कांग्रेस अधिवेशन और बदायूँ के लोगों का उसमें सम्मिलित होना

यद्यपि देश में कांग्रेस १८८५ में क़ायम हो चुकी थी और हर वर्ष दिसम्बर मास में उसका वार्षिक अधिवेशन प्रमुख नगरों में हुआ करता था और देश के सभी भागों से मुख्यतः अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे लोग उसमें सम्मिलित होते थे। पर बदायूँ के निवासी हिन्दू या मुसलमान उसमें १९१६ से पहले सम्मिलित नहीं हुए। प्रथम बार जब १९१६ में कांग्रेस की बैठक श्री अम्बिका चरण मजुमदार की अध्यक्षता में लखनऊ में हुई तब बाबू बालमुकन्द सहाय वकील, श्री लक्ष्मण दत्त बदायूँ से भाग लेने उसमें पहुँचे। उधर रघुवीर सहाय, जो उस समय आगरा कालेज में बी०एस०सी० में पढ़ रहे थे, लखनऊ गये और कांग्रेस में शामिल हुए।

लखनऊ पैक्ट, लोकमान्य तिलक व गांधी जी की उपस्थिति कांग्रेस में

वहाँ लोक मान्य तिलक, जो कुछ समय पहले मांडले से ६ साल की सज़ा काट कर आये थे, उपस्थित थे। महात्मा गांधी, जो दक्षिण अफ़्रीका से कई साल वहाँ रहने के बाद हिन्दुस्तान वापस आये थे, लखनऊ कांग्रेस में भाग लेने को मौजूद थे। बदायूँ के लोगों ने उन दोनों महान नेताओं को देखा और उनके भाषण सुने और प्रभावित हुए। उसी समय मुस्लिम लीग का भी वार्षिक अधिवेशन लखनऊ में हो रहा था। कांग्रेस व लीग दोनों में एक समझौता हुआ जो लखनऊ पैक्ट के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तिलक महाराज ने कांग्रेस अधिवेशन में उस समझौते की पुष्टि कराने हेतु एक प्रस्ताव पेश किया जिस पर भाषण करते हुए उन्होंने कहा :

"कांग्रेस व लीग दोनों ही उत्तर प्रदेश में मिल कर काम करने लगी हैं और यह सौभाग्य उनको लखनऊ शहर में प्राप्त हुआ है", उस समय उत्तर प्रदेश संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध के नाम से पुकारा जाता था। बदायूँ से आये हुए लोगों ने इन सब चीज़ों को देखा व सुना, वे बड़े प्रभावित हुए।

देहली में कांग्रेस अधिवेशन

इसके पश्चात् जब १९१८ में कांग्रेस अधिवेशन देहली में हुआ तब रघुवीर सहाय आगरा से ही वालिन्टियर बनकर उसमें भाग लेने पहुँचे। हकीम अजमल खाँ स्वागत समिति के अध्यक्ष थे और यद्यपि लोक मान्य तिलक उस अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए चुन लिये गये थे, पर वे अपने मुक़दमे के कारण, जो इंग्लैंड में सर वैलन्टाइन शिरोल के ख़िलाफ़ दायर किया था और जिसकी सुनाई उक्त तारीख़ में पड़ गई थी, उपस्थित न हो सके। उनकी अनुपस्थिति में पं० मदन मोहन मालवीय ने अध्यक्ष पद का भार सम्हाला और बड़ा प्रभावशाली भाषण दिया। उस कांग्रेस के अधिवेशन में प्रथम बार नरम दल के लोग शरीक नहीं हुए। उन्होंने अपना अलग सम्मेलन बम्बई में बुलाया।

विश्व महायुद्ध

प्रथम विश्व महायुद्ध १९१४ में आरम्भ होकर १९१८ में समाप्त हुआ। युद्ध के दौरान सारे देश के लोगों ने और सभी राजनैतिक पार्टियों ने ब्रिटिश सरकार को धन व अन्य सामग्री देकर व पुरुषों को फ़ौज में भर्ती करके सहायता की, जिसके कारण ब्रिटिश सरकार को सफलता प्राप्त हुई। जर्मनी पराजित हुआ। युद्ध की समाप्ति पर राजनैतिक क्षेत्रों में और विशेषकर शिक्षित समुदाय में ऐसी आशायें बँधने लगीं कि शासन प्रणाली में समुचित सुधार लाये जायेंगे और देश के लोगों को शासन में अधिकार प्रदान किये जायेंगे। युद्ध के दौरान ही में सिक्रेटरी आफ़ स्टेट मिस्टर मांटेग्यू ने हिन्दुस्तान आकर वायसराय चेम्सफ़ोर्ड से परामर्श किया और वह अन्य राजनैतिक नेताओं से भी मिले। उनके इंग्लैण्ड वापस जाने पर पार्लियामिन्ट में एक घोषणा की गई जिसमें कहा गया कि ब्रिटिश शासन का ध्येय है कि भारत में स्वशासन पद्धति धीरे-धीरे लागू की जाये ताकि आगे चलकर पूर्ण रूप से वह अपना शासन कर सके। इस घोषणा के फलस्वरूप भारतवर्ष के समस्त बुद्धिजीवियों और बदायूँ के पढ़े लिखे लोगों में मुख्यतः उनमें, जिन्होंने पिछले कांग्रेस के अधिवेशनों में भाग लिया था और जो नियमित रूप से समाचार पत्र पढ़ते थे, ऐसा अनुमान लगाया जाने लगा कि सुधार अवश्य आयेंगे और स्वशासन के अधिकार प्राप्त होंगे।

राउलेट बिल

इधर लड़ाई समाप्त होते ही हिन्दुस्तान में फ़ौजी सिपाहियों के वापस होने पर देश व्यापी इनफ़्लोइन्ज़ा का प्रकोप हुआ जिसके कारण लाखों मनुष्य व पशु मरने लगे। देश भर में हाहाकार मच गया। उसी समय ब्रिटिश सरकार ने हिंसात्मक कार्यवाहियों को रोकने के बहाने केन्द्रीय असेम्बली में दो क़ानून के मसौदे राउलेट बिल के नाम से पेश कर दिये जिनका अभिप्राय यह था कि सरकार किसी भी व्यक्ति को केवल सन्देह के आधार पर कि वह हिंसात्मक कार्यवाही करने वाला है, बिना वारण्ट गिरफ़्तार कर सकती है। इसके उपरान्त उन पर मुक़दमे चलाकर, जिनकी सुनाई एकान्त में होगी 'इन कैमरा' जिनमें ज़ाप्ता फ़ौजदारी का प्रयोग नहीं किया जा सकता और सज़ा के बाद अपील नहीं की जा सकेगी। इन नादिरशाही क़ानूनों का असेम्बली में सभी ग़ैर सरकारी सदस्यों ने कड़ा विरोध किया। उनके विरोध के बावजूद क़ानून पास कर दिये गये और वायसराय ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। फलस्वरूप देश भर में असन्तोष की लहर फैल गई और काले क़ानूनों की भर्त्सना होने लगी।