Est. 1974

बदायूँ की आवाज़

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Foreword

This book was written in Hindi in 1974 and is presented here exactly as published — it is not translated. Menus and navigation switch language; the text of the book does not.

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का इतिहास वस्तुत: बलिदान एवं बलिदान की द्वितीय गाथा है। इसका उदाहरण विश्व के इतिहास में अन्यत्र नहीं मिलता है। स्वतन्त्रता अर्जित करने के प्रयत्नों का शुभारम्भ १८५७ के प्रथम संग्राम से होता है और इसकी परिणति १९४७ में हुई जब हम विदेशी दासता के बन्धनों से उन्मुक्त हुये।

स्वतन्त्रता संग्राम में हज़ारों लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, अनेक कष्ट सहे, कठोर कारावास का दण्ड भोगा, अपनी सम्पत्ति से हाथ धोया और न जाने कितने प्रकार की यातनायें सहीं। स्वतंत्रता संग्राम के अन्तिम चरण में महात्मा गांधी का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने सत्य अहिंसा के अमोघ अस्त्र से स्वतन्त्रता आन्दोलन को नयी दिशा तथा गति दी और अपने को निरीह तथा निराश समझने वाली जनता में आशा, विश्वास तथा शक्ति का संचार किया। फलत: वह सबल तथा सशक्त विदेशी सत्ता का अहिंसक क्रांति द्वारा सामना करने के लिए उद्यत हुई। इस अहिंसक क्रांति ने गांव-गांव, शहर-शहर में नई चेतना तथा स्फूर्ति पैदा की। सबल अंग्रेजी शासन ने इस अमोघ अस्त्र के सम्मुख अपने को निरीह पाया और अन्तत: उसके पैर उखड़ गये।

इस क्रान्ति का इतिहास स्वयमेव प्रेरणा तथा स्फूर्तिदायक है। आने वाली संतति इतने अधिक बलिदान, त्याग तथा तपश्चर्या के उपरान्त प्राप्त अपनी स्वतन्त्रता को अक्षुण बनाये रखने के लिए कृत संकल्प होगी और उसकी रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए सदैव तत्पर रहेगी। यही इस गौरवमय गाथा की सार्थकता है।

मुझे प्रसन्नता है कि बदायूँ ज़िले का स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास प्रकाशित हो रहा है। इस कार्य में श्री रघुवीर सहाय ने कठोर परिश्रम किया और उनकी सूझ-बूझ तथा मार्ग दर्शन में यह सामग्री तैयार की गई। वे इस कार्य के लिए बधाई के पात्र हैं। मुझे विश्वास है यह सामग्री पाठकों को रुचिकर लगेगी, वे इसका अध्ययन करेंगे तथा इससे प्रेरणा लेंगे।

— कमलापति त्रिपाठी