पुस्तक के बारे में
यह पुस्तक किस विषय पर है
"बदायूँ जिले के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास" यह दस्तावेज़ प्रस्तुत करती है कि १९१९ से १९४७ के बीच वर्तमान उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन कैसे स्थानीय स्तर पर घटित हुआ — असहयोग आंदोलन से लेकर नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो आंदोलन, और अंततः विभाजन व स्वतंत्रता तक।
ब्रिटिश शासन के अधीन भारत — संक्षेप में
इस पुस्तक की कथा शुरू होने तक भारत १८५८ से सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन था — जब ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता ताज को सौंप दी गई थी। मुट्ठी भर ब्रिटिश अधिकारी, औपनिवेशिक प्रशासन और सेना के सहारे, करोड़ों लोगों वाले इस उपमहाद्वीप पर शासन करते थे।
औपनिवेशिक शासन ने रोज़मर्रा के जीवन को गहराई से प्रभावित किया — भू-राजस्व प्रणालियाँ जो किसानों को कर्ज़ और अकाल की ओर धकेल सकती थीं, भारतीय उद्योगों पर प्रतिबंध जो ब्रिटिश उत्पादन के पक्ष में थे, और एक कानूनी-प्रशासनिक ढांचा जो सबसे पहले औपनिवेशिक हितों की सेवा करता था। यही परिस्थितियाँ बड़े शहरों जितनी ही बदायूँ जैसे कस्बों और गांवों में भी महसूस की जाती थीं — और यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन पनपा।
स्वतंत्रता आंदोलन — संक्षेप में
१८८५ में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य मंच बनी। १९१५ में महात्मा गांधी की भारत वापसी और अहिंसक सविनय अवज्ञा (सत्याग्रह) को अपनाने से आंदोलन ने ऐसा रूप लिया जिसमें आम जनता की सच्ची भागीदारी हुई — जो राजनीतिक वर्ग से कहीं आगे, देशभर के कस्बों और गांवों तक पहुँची।
असहयोग आंदोलन (१९२०–२२), नमक सत्याग्रह (१९३०), सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन (१९४२), और अंततः १९४७ में स्वतंत्रता व विभाजन — ये राष्ट्रीय कालक्रम के प्रमुख पड़ाव हैं। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि यह बताती है कि इनमें से हर पड़ाव को एक विशेष जिले में वास्तव में कैसे अनुभव किया गया — किसने मार्च किया, किसे जेल हुई, स्थानीय स्तर पर किसने संगठन खड़ा किया, और बदायूँ के अपने गांवों-कस्बों में क्या घटित हुआ।
ऊपर ब्रिटिश शासन और स्वतंत्रता आंदोलन पर दिए गए अनुभाग इस वेबसाइट के लिए लिखी गई मूल पृष्ठभूमि सामग्री हैं, न कि १९७४ की पुस्तक का अंश।
यह पुस्तक कैसे लिखी गई
इसकी शुरुआत १५ अगस्त १९७२ को बदायूँ में स्वतंत्रता की रजत जयंती के एक समारोह से हुई, जिसमें जिले के जीवित स्वतंत्रता सेनानी एकत्र हुए थे। उस समय के ज़िलाधीश फ़रहत अली ने सुझाव दिया कि जिले के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास तैयार किया जाए। ज़िला नागरिक परिषद्, बदायूँ ने यह कार्य अपने हाथ में लिया और इसे रघुवीर सहाय को सौंपा — जो स्वयं इस आंदोलन में सक्रिय भागीदार रहे थे।
सहाय जी ने कांग्रेस आंदोलन में अपनी व्यक्तिगत भागीदारी, उस समय समाचार-पत्रों (लीडर, इंडिपेंडेंट, अमृत बाज़ार पत्रिका, नेशनल हैरल्ड, इंडियन डेली टेलीग्राफ तथा हिन्दुस्तान टाइम्स सहित) में प्रकाशित अपने ही लेखों, कांग्रेस व गांधी जी पर प्रकाशित इतिहासों, ज़िला गजेटियर, तथा साथी स्वतंत्रता सेनानियों व निवासियों से प्राप्त जानकारी का सहारा लिया। पुस्तक १९७४ में प्रकाशित हुई।
मूल १९७४ संस्करण की बहुत कम प्रतियाँ बची होने की जानकारी है। यह वेबसाइट परिवार के पास सुरक्षित प्रति से — पृष्ठ-दर-पृष्ठ स्कैन करके — तैयार की जा रही है, ताकि बदायूँ के स्वतंत्रता संग्राम का यह विवरण भावी पाठकों, शोधार्थियों तथा पुस्तक में वर्णित लोगों के वंशजों के लिए सुलभ बना रहे।