स्थापना १९७४
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दो शब्द

यह पुस्तक १९७४ में हिंदी में लिखी गई थी और यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत है जैसे प्रकाशित हुई थी — इसका अनुवाद नहीं किया गया है। मेनू व नेविगेशन भाषा बदलते हैं; पुस्तक का पाठ नहीं बदलता।

स्वतंत्रता प्राप्त होने की रजत जयन्ती के उपलक्ष में १५ अगस्त, १९७२ को एक समारोह में, जिसमें अधिकांश जिले के स्वतंत्रता सेनानी उपस्थित थे, स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के ऊपर प्रकाश डाला गया, तब ज़िलाधीश श्री फ़रहत अली ने एक सुझाव दिया कि जिले के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास तैयार किया जाय। इसी सुझाव को उन्होंने अन्य स्थानों पर भी दोहराया, जिसका दूसरों ने समर्थन किया।

इसके पश्चात् ज़िला नागरिक परिषद ने इस प्रश्न पर विचार किया जिसमें यह निश्चय हुआ कि बदायूँ ज़िले के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा जाय और यह काम मेरे सुपुर्द किया गया। मैंने तब नागरिक परिषद के सदस्यों को बताया कि यह काम अति उत्तम है पर यदि किसी दूसरे व्यक्ति के सुपुर्द किया जाय तो अच्छा होगा। मैं उसको पूरी सहायता दूँगा। मैं स्वतंत्रता संग्राम के अनेक आन्दोलनों से पूरी तरह बिंधा हुआ हूँ। मुझे स्वयं अपना नाम देना अच्छा नहीं मालूम होगा, पर मेरी इस दलील को नहीं माना गया और वह काम मेरे ही सुपुर्द कर दिया गया। मैंने सहर्ष, पर दुविधा के साथ, इस ज़िम्मेदारी को स्वीकार कर लिया।

इतिहास के तैयार करने में सबसे अधिक सहायता जो मुझको मिली वह मेरे प्रत्येक कांग्रेस आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने और समय-समय पर जो मैंने अपने विचार समाचार पत्रों में प्रकाशित कराये जिनकी पूरी फ़ायलें मेरे पास मौजूद थीं; उनसे मिली। मैंने न केवल अपने विचारों को ही समाचार पत्रों में प्रकाशित कराया वरन् समय-समय पर महत्वपूर्ण घटनाओं के भी समाचार प्रकाशित कराये। ऐसे विचार व समाचार 'लीडर' व 'इन्डिपेन्डेन्ट', इलाहाबाद, 'अमृत बाज़ार पत्रिका' कलकत्ता व इलाहाबाद, 'इन्डिपैन्डैन्स' 'नेशनल हैरिल्ड' व 'इण्डियन डेली टेलीग्राफ' लखनऊ तथा 'हिन्दुस्तान टाइम्स' देहली में प्रकाशित होते रहे जिनका संग्रह मेरे पास था और जिनका मैंने उपयोग किया।

इतिहास के लिखते समय यह समस्या मेरे सामने कई बार उपस्थित हुई कि मैं अपना नाम स्वयं इसमें कैसे दूँ और क्या अपने नाम को इससे पृथक् किया जा सकता है। यदि मैं अपने नाम को निकाल कर इतिहास लिखता हूँ तो वह अवश्य अधूरा रह जायेगा। अपने सम्बन्ध में मैंने जो भी लिखा है वह उस समय की घटनाओं का एक प्रकार से ब्योरा दिया गया है, इससे अधिक कुछ नहीं है। उसमें क्या उचित था अथवा क्या अनुचित, इसका तो पाठक गण स्वयं ही निर्णय कर सकेंगे।

इतिहास लिखने में इस सामग्री के अतिरिक्त जो मेरे पास थी, या मेरी जानकारी में थी, मुझे पट्टाभि सीतारमैया लिखित कांग्रेस का इतिहास (अनुवाद: हरिभाऊ उपाध्याय), आचार्य कृपलानी द्वारा लिखित 'गांधी हिज़ लाइफ़ एण्ड थाट', 'सिविल डिस-ओबीडियेन्स', इन्क्वारी रिपोर्ट, कांग्रेस रिपोर्ट, पंजाब मार्शल ला के बारे में — इनसे सहायता मिली। भूमिका तैयार करने में मुझे बदायूँ डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटियर, अहीछत्र, शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित पुस्तक व गिरिराज नन्दन का लिखा हुआ 'आँवला का इतिहास' तथा अन्य मित्रों द्वारा प्राप्त जानकारी से मदद मिली। डिस्ट्रिक्ट गेज़ेटियर ज़िलाधीश फ़रहत अली ने मुझे उपलब्ध कराया।

जहाँ तक तोड़-फोड़ के कार्यों की बात है, उनके सम्बन्ध में मैंने विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी प्राप्त की है। १८५७ के विद्रोह के सम्बन्ध में जो भी जानकारी इसमें दी गई है वह मुख्यत: डिस्ट्रिक्ट गेज़ेटियर के आधार पर है।

मैं उन सब मित्रों का आभारी हूँ जिन्होंने मुझे जानकारी दी है। बदायूँ के प्राचीन काल के होने के बारे में स्वामी श्यामानन्द ने बहुमूल्य बातें बताई हैं व श्री प्यारे लाल भंडारी ने वह सब कवितायें मुझे उपलब्ध कराईं, जो उनकी स्वयं रचनायें हैं और जो उन्होंने समय-समय पर तैयार कर आंदोलनों के दिनों में सुनाईं। मैं इन दोनों मित्रों का आभारी हूँ।

ज़िलाधीश महोदय ने न केवल इतिहास की बात स्वयं सुनाई वरन् इसके तैयार करने में हर प्रकार की सुविधा मुझे दी, अनेक आवश्यक जानकारी उनके कार्यालय द्वारा प्राप्त हुई। इतिहास के लिख जाने के पश्चात उसको टाइप कराने का काम ज़िलाधीश की सहायता से ही हो सका है। मैं उनका हृदय से आभारी हूँ।

इस पुस्तक में जो फ़ोटो-ग्राफ़्स दिये गये हैं वे मास्टर जंगबहादुर जौहरी ने मुझे प्रदान किये हैं। उनका कांग्रेस संस्था से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। मैं उनका भी आभार प्रकट करता हूँ। अन्त में मैं आशा करता हूँ कि यह पुस्तक बदायूँ ज़िले के स्वतंत्रता संग्राम की एक झांकी के रूप में आयेगी और बदायूँ का संक्षिप्त इतिहास इसके द्वारा प्राप्त हो सकेगा। जो कुछ भी इसमें लिखा गया है, यद्यपि उसकी जानकारी अनेक सूत्रों से प्राप्त की गई है, पर इसकी पूर्णतया ज़िम्मेदारी मेरी है।

बदायूँ — रघुवीर सहाय