अध्याय 2 / 11
असहयोग आन्दोलन
1919–23
यह पुस्तक १९७४ में हिंदी में लिखी गई थी और यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत है जैसे प्रकाशित हुई थी — इसका अनुवाद नहीं किया गया है। मेनू व नेविगेशन भाषा बदलते हैं; पुस्तक का पाठ नहीं बदलता।
६ अप्रैल १९१९ की हड़ताल
महात्मा गांधी, जो पिछले कई वर्षों से देश की स्थिति का अध्ययन कर रहे थे, उन्होंने इन कानूनों के पास होने पर ६ अप्रैल, १९१९ को सारे देश में हड़ताल के लिये आवाहन किया। उस दिन लोग अनशन करें और अपना सब काम त्याग दें। देश भर में उस दिन हड़ताल मनाई गई और सायंकाल को सार्वजनिक सभायें हुईं, जिनमें “काले कानूनों” का विरोध किया गया। बदायूँ में भी उस दिन हड़ताल रही और सायंकाल रेलवे स्टेशन धर्मशाला पर एक सभा का आयोजन किया गया जिसमें विशेषकर वकील लोगों ने भाग लिया—रघुवीर सहाय उस समय तक एल०एल०बी० की डिग्री प्राप्त कर आगरे से आ गये थे और वकालत करने लगे थे। वह भी सभा में शरीक हुए—एटा के श्री बाबूराम वर्मा भी उसमें उपस्थित थे। जोरदार भाषण हुए और काले कानूनों का विरोध किया गया। उस समय एक वकील बाबू उमाशंकर, जो सभा में उपस्थित थे, इतने उत्तेजित हो गये कि उन्होंने जोरदार शब्दों में कह डाला—“चेम्सफोर्ड बदमाश”—चेम्सफोर्ड उस समय हिन्दुस्तान के वाइसराय थे और उन्हीं के कार्यकाल में काले कानून केन्द्रीय एसेम्बली में पास कराये गये थे। श्री उमा शंकर के यह शब्द सी०आई०डी० ने, जो सभा में उपस्थित थी, नोट कर लिये और डि० जज के नोटिस में लाये गये। अगले दिन डि० जज ने बाबू उमा शंकर को नोटिस देकर उत्तर मांगा कि उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों न की जाये। सिविल बार के मेम्बर्स ने, जिनमें प्रमुख बाबू राज कुमार वकील थे, बीच में पड़कर बाबू उमा शंकर से उन शब्दों के लिये खेद प्रकट करा के क्षमा याचना करा दी—मामला वहीं खत्म हो गया पर एक नई चेतना का आरम्भ बदायूँ में शुरू हो गया।
जलियान वाला बाग़ काण्ड
इधर ६ अप्रैल के बाद १३ अप्रैल को अमृतसर में जो जलियान वाले बाग़ का हत्याकांड हुआ उसकी खबर प्राप्त होने पर बदायूँ वालों के दिल हिल गये। अंग्रेजी शासन की कड़ी आलोचनायें होने लगीं। एक जांच कमेटी पंजाब हत्याकांड और मार्शल ला के अत्याचारों के बारे में कांग्रेस की ओर से गठित की गई और दूसरा हंटर कमीशन, जो शासन की ओर से इन्हीं मामलों की जांच के लिए बनाया गया था। उन दोनों की कार्यवाहियों का ब्यौरा, जो अखबारों में प्रकाशित होता, उसको लोग बड़ी दिलचस्पी से पढ़ते थे। जो अमानुषिक अत्याचार पंजाब में उस समय हुए थे उसके प्रति गंभीर शोक व ब्रिटिश सरकार के प्रति रोष प्रकट करते थे।
मान्टेगू चेम्सफोर्ड सुधार
उसी समय वह सुधार भी देश के सामने आये जो चेम्सफोर्ड व मान्टेगू के परामर्श से ब्रिटिश सरकार लागू करना चाहती थी। उन सुधारों के फलस्वरूप प्रान्तीय विधान सभाओं में चुने गये सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई थी। चुने हुए सदस्यों से ही कतिपय मन्त्रियों के बनाने का प्राविधान किया गया था जिनको केवल वे विभाग ही दिये जायेंगे, जिनको विधान सभाओं के वोट की आवश्यकता होगी। अन्य के लिए जो ‘रिज़र्वड’ माने जायेंगे उनको केवल गवर्नर द्वारा नियुक्त किये हुए व्यक्तियों को ही सौंपा जायगा। इस कुल प्रणाली को ‘डायार्की’ के नाम से सम्बोधित किया गया। यह सुधार यद्यपि प्रचलित प्रणाली से कहीं अधिक प्रगतिशील थे पर इनको सारे देश ने असन्तोष जनक, नाकाफी और अनुदार माना।
पंजाब हत्याकांड के संबंध में कांग्रेस जांच रिपोर्ट का प्रकाशन
पंजाब के हत्याकांड के बारे में कांग्रेस की रिपोर्ट प्रकाशित हो गई। उधर हंटर कमीशन ने भी रिपोर्ट दे दी, जिसमें ओडायर व डायर को, जो दोनों ही इस हत्याकांड के जिम्मेदार थे, निर्दोष ठहराया गया, इसके प्रतिकूल कांग्रेस की रिपोर्ट में उन दोनों को दोषी ठहराया गया। ओडायर व चैम्सफोर्ड को वापस बुलाने की मांग की गई, जनरल डायर के लिये पद त्यागने को कहा गया।
अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन
पंजाब में मार्शल ला लागू किये जाने पर प्रान्त में भयानक स्थिति उत्पन्न हो गई थी जिसके कारण समूचे प्रदेश में भय, घबराहट और उदासीनता का वातावरण छा गया था और जिसको कांग्रेस के नेताओं ने जांच के दौरान स्वयं देखा था, अतः यह निश्चय किया गया कि दिसम्बर १९१९ में कांग्रेस का अधिवेशन अमृतसर में किया जाये। इस खबर को जानकर बदायूँ के पढ़े लिखे लोगों में विशेषकर वकील लोगों में अमृतसर अधिवेशन में जाने की बात चल पड़ी थी—रघुवीर सहाय ने पहले ही अपना इरादा वहाँ जाने का अपने मित्रों को बता दिया था। अधिवेशन में शामिल होने के लिए बाबू राजकुमार, बाबू बालमुकन्द सहाय, बाबू अमीरचन्द्र जौहरी, बाबू दयाशंकर वकीलों में से थे, मौ० अबुल हसन कादरी, श्री बृजलाल भदवार, श्री आर०आर० मैगलानी रघुवीर सहाय के अलावा वहाँ गये। रघुवीर सहाय ने प्रेस प्रतिनिधि की ओर से और अन्य ने डेलीगेट बनकर उसमें भाग लिया। सभी ने अमृतसर में जलियान वाला बाग देखा और दीवारों में वे निशानात, जो गोलियों के घुस जाने से बन गये थे। सभी पर इन सब दृश्यों का बड़ा प्रभाव पड़ा। उन सब ने उस गली को भी देखा जहाँ अमृतसर के लोगों को पेट के बल घिसटवाया जाता था। बदायूँ वापस आने पर सभी ने यह निश्चय किया कि तुरन्त कांग्रेस कमेटी की स्थापना की जाये।
बदायूँ में कांग्रेस कमेटी का गठन
१९२० के शुरू में ही बाबू राजकुमार के घर पर इकट्ठे होकर कांग्रेस कमेटी की स्थापना कर ली गई। श्री सैय्यद मोहम्मद (मैकू मियाँ) शेखूपुर, प्रेसीडेन्ट, श्री बृजलाल भदवार उभानी, सिक्रेटरी, बाबू राम स्वरूप, खजान्ची व बाबू श्यामाचरन वाइस प्रेसीडेन्ट चुने गये। श्री लक्ष्मण दत्त, रघुवीर सहाय, श्री हरि प्रपन्न सहाय, मुं० मंगलसेन, श्री लाल बहादुर, मास्टर जंग बहादुर इत्यादि सदस्य बना लिये गये। कांग्रेस कमेटी की बैठकें नियमित रूप से होने लगीं। कमेटी की ओर से कांग्रेस का पुराना साहित्य भी मंगाया गया जिसको विशेषकर नौजवान लोग पढ़ने लगे। अब समाचार पत्रों को जैसे इलाहाबाद के ‘लीडर’ को लोग काफी मात्रा में पढ़ने लगे। हिन्दी-उर्दू के अखबार भी आने लगे। देश में राजनैतिक उथल पुथल बढ़ जाने के कारण बदायूँ पर भी उसका काफी प्रभाव पड़ा। विश्व युद्ध के समाप्ति पर जो खिलाफत को भंग करने का निश्चय ब्रिटिश सरकार ने किया उससे मुसलमानों को बहुत आघात पहुँचा। हंटर कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हो जाने पर और पंजाब के हत्याकांड के जिम्मेदारों को निर्दोष ठहराने पर देश भर में और भी असन्तोष की लहर फैल गई—सुधारों को तो पहले ही अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में असन्तोषजनक बता दिया गया था। गांधी जी ने देश की परिस्थितियों पर विचार करने के उपरान्त असहयोग की नीति घोषित कर दी। मुसलमान पहले से ही उत्तेजित हो चुके थे वह भी इस नीति का समर्थन पूर्णतया करने को तैयार हो गये।
कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन
महात्मा गांधी के सुझाव पर कांग्रेस का विशेष अधिवेशन सितम्बर १९२० को कलकत्ते में असहयोग सम्बन्धी प्रस्ताव पर विचार करने को बुलाया गया। केवल रघुवीर सहाय बदायूँ से इस अधिवेशन में डेलीगेट के रूप में सम्मिलित हुए। अधिवेशन की अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की, जो ६ वर्ष बाद अमेरिका से लौट कर आये थे। जिन्ना, सी०आर० दास, पन्डित मोती लाल नेहरू आदि सभी बड़े नेता वहाँ उपस्थित थे। गांधी जी ने असहयोग सम्बन्धी प्रस्ताव रखा जिसका कड़ा विरोध जिन्ना व दूसरे बड़े नेताओं की ओर से किया गया। केवल पं० मोती लाल नेहरू ने उसका समर्थन किया। असहयोग प्रस्ताव के मुख्य अंग इस प्रकार हैं:—
विधान सभाओं के चुनावों का बाइकाट
अदालतों का बाइकाट, वकील अपनी वकालतें छोड़ें
सरकारी कर्मचारी अपने पद से त्याग पत्र दें
सरकारी स्कूल व कालेजों से विद्यार्थी निकल आवें
विदेशी कपड़ों का बहिष्कार
नशीली वस्तुओं का बहिष्कार
छुआ-छूत का बहिष्कार
हिन्दू-मुस्लिम एकता व अहिंसा व्रत पालन
बदायूँ कांग्रेस कमेटी की बैठक
कांग्रेस के खुले अधिवेशन में बहस के पश्चात मत विभाजन हुआ। बहुत बड़े बहुमत से असहयोग सम्बन्धी प्रस्ताव पास हुआ। रघुवीर सहाय ने उस समय अपना मत प्रस्ताव के विरोध में डाला। पर कलकत्ते से लौटने के पश्चात उन्होंने यह निश्चय किया कि प्रस्ताव का पूर्ण रूप से पालन किया जाये और उनके ही आग्रह पर बदायूँ कांग्रेस कमेटी की बैठक २० सितम्बर १९२० को बुलाई गई। उक्त बैठक में सदस्यों के अलावा और भी लोग उपस्थित थे—रघुवीर सहाय ने कलकत्ते में पास हुए प्रस्तावों को बैठक के समक्ष उपस्थित किया जो सर्व-सम्मति से श्री सैय्यद मोहम्मद की अध्यक्षता में पास हुआ। सभी कमेटी के अधिकारीगण उसमें उपस्थित थे—उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनावों के लिये जो व्यक्ति खड़े हो गये थे उन सबको, यानी श्री बृजलाल भदवार, श्री राज कुमार, श्री सैय्यद मोहम्मद, श्री इकराम आलम को प्रस्ताव की एक-एक प्रति भेजना और उनसे चुनाव न लड़ने का अनुरोध करना निश्चय हुआ।
उम्मीदवार चुनावों से हट गये
फलस्वरूप श्री राजकुमार व श्री बृजलाल भदवार चुनाव से हट गये और नामज़दगी के पर्चे नहीं दाखिल किये। नामज़दगी की तारीख़ पर नान मुस्लिम सीट के लिए कोई नामांकन पत्र दाखिल न होने पर, जी०के० डार्लिंग कलेक्टर ने अपने सरकारी वकील राय साहब बाबू दयाशंकर का नामांकन पत्र दाखिल करा के उनके निर्विरोध चुने जाने का एलान कर दिया।
जी०के० डार्लिंग, कलेक्टर की प्रतिक्रिया
इस बैठक की कार्यवाही श्री जी०के० डार्लिंग, जो उस समय कलेक्टर थे, उनके नोटिस में लाई गई। उन्होंने कांग्रेस कमेटी के अधिकारियों से पृथक-पृथक बात-चीत की और उनसे आश्वासन ले लिया कि वह उस प्रस्ताव को अगली बैठक में रद्द करा देंगे। अगली बैठक २६ सितम्बर १९२० को बुलाई गई। बाबू राजकुमार ने प्रस्ताव किया कि पिछला असहयोग सम्बन्धी प्रस्ताव वापस ले लिया जाये। उपस्थित सदस्यों में से अधिकांश ने इसका विरोध किया और बाबू राजकुमार को बोलने नहीं दिया, जिसके कारण असहयोग वाला प्रस्ताव ज्यों का त्यों रहा। इस पर कांग्रेस कमेटी के सभी अधिकारियों ने, जिन्होंने कलेक्टर को प्रस्ताव वापस करने का आश्वासन दिया था, सामूहिक तौर पर इस्तीफे दे दिये। श्री सैय्यद मोहम्मद अध्यक्ष पद से, श्री बृज लाल भदवार मंत्री पद से, श्री बाबू राजकुमार व मौलवी अबुल हसन क़ादरी ने मंत्री पद से, श्री बाबू रामस्वरूप ने खजान्ची पद और बाबू श्यामा चरन ने उप प्रधान पद से त्याग पत्र दे दिये। कमेटी की बैठक उसके बाद स्थगित कर दी गई।
कलेक्टर के इजलास में पेशी
अगले दिन श्री जी०के० डार्लिंग ने मीटिंग का सब हाल मालूम करके केवल हिन्दू वकील व मुख्तार साहबान को अपनी अदालत में हाज़िर होने का आदेश दिया जिन्होंने कांग्रेस कमेटी की बैठक में असहयोग संबंधी प्रस्ताव को वापस लेने का विरोध किया था। यह आदेश श्री मुश्ताक अली हाकिम परगना बदायूँ के नाम से १० व्यक्तियों के पास भेजा गया था। अपनी अदालत में कलेक्टर ने जिले के समस्त परगनाधीशों को, कप्तान पुलिस, इन्सपेक्टर पुलिस व कोतवाल शहर को भी अपने बराबर कुर्सियों पर विराजमान करा लिया था। दस में से केवल ८ व्यक्ति ही उपस्थित हुए। एक किसी कारणवश उपस्थित नहीं हो सके। कलेक्टर ने हर व्यक्ति से पृथक-पृथक प्रश्न किया कि उन्होंने २६ सितम्बर वाली कांग्रेस की बैठक में असहयोग सम्बन्धी प्रस्ताव के वापस लेने के पक्ष में अथवा विपक्ष में वोट दिया? उनमें से ५ व्यक्तियों ने, जिनमें बाबू लाल बहादुर मुख्तार भी शामिल थे, साफ कह दिया कि वह असहयोग वाले प्रस्ताव के विरोध में हैं और इस बारे में एक बयान पब्लिक में प्रकाशन हेतु दे देंगे। अन्य चार श्री लक्ष्मण दत्त, रघुवीर सहाय, श्री हरि प्रपन्न सहाय व मुंशी मंगलसेन ने प्रस्ताव का समर्थन किया और कहा कि वह किसी हालत में उसको वापस लेने को तैयार नहीं हैं। कलेक्टर ने इस पर रोब भरे शब्दों में कहा कि उनको किसी प्रकार का सहयोग कलेक्टर अथवा दूसरे अधिकारियों की तरफ से प्राप्त नहीं होगा और अन्य कार्यवाही के लिए, जो उनके खिलाफ की जायेगी, उनके नाम डि० जज के पास भेजे जायेंगे। कलेक्टर महोदय ने अगर नाम भेजे भी हों तो भी डि० जज की ओर से कोई कदम नहीं उठाये गये।
नागपुर कांग्रेस अधिवेशन
असहयोग संबंधी प्रस्ताव, जो कलकत्ते के विशेष अधिवेशन में पास हुआ था, वह पुनः दिसम्बर १९२० को नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में प्रस्तुत किया गया। यह कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन था। इसमें शरीक होने के लिए अनेक पार्लियामेन्ट के सदस्य इंगलैण्ड से भी आये थे। प्रस्ताव बहुमत से पास कर दिया गया। नागपुर का अधिवेशन जिन्ना साहब का आखिरी कांग्रेस अधिवेशन था। इसके बाद वह कांग्रेस से पृथक हो गये और फिर कभी नहीं आये। रघुवीर सहाय बदायूँ से इस कांग्रेस में भी सम्मिलित हुए और वहाँ से वापस लौटने के पश्चात उन्होंने निश्चय किया कि वह अपनी वकालत छोड़ देंगे।
वकालतों का त्याग
इस निश्चय के अनुसार जब वह १६ जनवरी, १९२१ को मौलाना आज़ाद सुबहानी की कानपुर वाली आम सभा में गये तो मौलाना आज़ाद के प्रभावशाली भाषण के तुरन्त बाद उन्होंने व श्री लक्ष्मण दत्त ने अपनी-अपनी वकालत छोड़ देने का एलान कर दिया। उनके साथ ही उसी जलसे में हाफिज ज़हूर अहमद मुख्तार ने भी अपनी मुख्तारी छोड़ने का एलान किया। जलसे में कु० रुक्म सिंह ने आनरेरी मुन्सिफी के पद से त्याग पत्र देने का एलान किया और लक्ष्मण दत्त के भाई शत्रुघन ने अपने स्कूल के मास्टर पद से त्याग पत्र देने का एलान किया। कतिपय लड़कों ने, जो अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते थे, उनको छोड़ने का एलान किया। पर बाद को राष्ट्रीय स्कूल के कायम होने पर उसमें दाखिल हो गये। उसी समय हरशरण वर्मा भी स्कूल की दसवीं कक्षा से निकल आये। वह फिर स्कूल कभी नहीं गये। देश के कार्य में ही लगे रहे। पहले खादी का काम उस समय के राजस्थान के रजवाड़ों में किया, बाद को १९३० से जो भी आन्दोलन गांधी जी ने चलाये उन सब में वह बदायूँ से जेल गये और अन्त में १९४४ में नजरबन्दी से रिहा हुए।
कांग्रेस कमेटी का कार्य व प्रचार
स्थानीय कांग्रेस कमेटी के सामूहिक रूप से त्याग पत्र दे देने के पश्चात व अन्य व्यक्तियों के पब्लिक एलान के बाद कि वह असहयोग प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं, अब सारा भार कांग्रेस कमेटी का श्री लक्ष्मण दत्त व रघुवीर सहाय के कन्धों पर आ पड़ा। वकालतें त्याग देने के बाद जब राष्ट्रीय विद्यालय कायम हुआ तो दोनों उसमें भी थोड़ा समय देने लगे। दोनों ही ने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कर दिया और खद्दर के वस्त्र पहनने लगे। रोजाना सांयकाल को नगर के किसी भाग में सार्वजनिक सभा कर यह दोनों कुछ अन्य साथियों के साथ असहयोग आन्दोलन का प्रचार करते थे। हिन्दू मुस्लिम एकता, अछूत उद्धार, अहिंसा, खद्दर का इस्तेमाल, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार इन सब पर बल देते थे। जनता बड़ी संख्या में इन सभाओं में आती थी और भाषणों को बड़ी दिलचस्पी से सुनती थी।
‘यंग इण्डिया’ द्वारा प्रचार
उस समय गांधी जी ‘यंग इण्डिया’ द्वारा अपना प्रचार करते थे। सभी शिक्षित जन, विशेषकर जो कांग्रेस से संबंधित थे, उसको बड़े ध्यान से पढ़ते थे। विदेशी कपड़ों का बहिष्कार अब जोरों से चल रहा था। बदायूँ में भी श्री लक्ष्मण दत्त व रघुवीर सहाय ने अपने अनेक साथियों सहित, जिनमें श्री करुणा शंकर भी शामिल थे, घर-घर जाकर विदेशी कपड़ों को मांगकर और स्वयं अपने सब विदेशी कपड़े देकर एक विशाल ढेर इकट्ठा कर लिया। उसको भस्म करने के लिये श्री जियाराम सक्सेना बरेली को आमंत्रित किया गया। जिन्होंने एक भारी जन सभा में उसको अपने हाथों से आग लगाई।
खिलाफत आन्दोलन व गांधी जी का बदायूँ में आगमन व उनका भाषण
खिलाफत आन्दोलन साथ-साथ चल रहा था। मौलाना अब्दुल माजिद बदायूँनी ने खिलाफत के संबंध में अपने जोशीले भाषणों द्वारा देश व्यापी ख्याति हासिल कर ली थी और गांधी जी व अली बिरादरान के निकट सम्पर्क में आ गये थे। उन्हीं के आग्रह पर महात्मा गांधी जी पहली बार १ मार्च सन् १९२१ में बदायूँ में मौलाना शौकत अली, डाक्टर सैफुद्दीन किचलू, कस्तूरबा गांधी, सैय्यद मोहम्मद हुसैन सेक्रेटरी प्रान्तीय खिलाफत कमेटी यू०पी०, मौलाना सलामतुल्ला फिरंगी महली, मौ० निसार अहमद कानपूरी के साथ पधारे। बड़ा शानदार स्वागत बदायूँ स्टेशन पर किया गया जहाँ सजी हुई मोटर बिल्कुल रेल के डिब्बे के निकट खड़ी कर दी गई थी। रेल से उतर कर महात्मा गांधी, शहर में गश्त करते हुए कादरी मंज़िल पहुँचाये गये जहाँ उनको निवास करना था। यह उस जमाने की सबसे अच्छी और शानदार कोठियों में से थी। स्थानीय वकीलों इत्यादि से मिलकर और बातचीत करने के पश्चात वह तुरन्त सभा स्थल पर पहुँच गये जहाँ एक विशाल जन समूह इन्तज़ार कर रहा था—उसमें भाषण देते हुए उन्होंने कहा:—
“हम खिलाफत व पंजाब के अत्याचारों का इन्साफ और स्वराज ८ महीने के अन्दर इस सूरत में हासिल कर सकते हैं कि हम सब इन सात शर्तों को पूरा कर लें:—
१—हम अहिंसा का प्रयोग न केवल कर्म से वरन् विचारों से भी करें।
२—हिन्दू-मुस्लिम एकता कायम की जाये और सब मिलकर एक कौम बनावें।
३—स्वदेशी कपड़ों का इस्तेमाल किया जाये और चरखे का प्रयोग कर ६० करोड़ रुपया, जो विदेशों को सालाना जाता है वह बचाया जाये।
४—शरीर व विचारों की स्वच्छता, नशीली चीजों का बहिष्कार, सिग्रेट, बीड़ी से परहेज और दूसरी बुरी आदतों को छोड़ना।
५—गवर्नमेंट की ओर से सख्ती किये जाने पर न डरना।
६—अंग्रेजों को परेशान न किया जाये और जो अपने हम ख्याल नहीं हैं उन पर किसी प्रकार का दबाव न डाला जाये।
७—तिलक स्वराज्य फण्ड के लिए धन इकट्ठा किया जाये।”
आंधी के कारण सभा में अव्यवस्था
आंधी व हवा तेज चलने के कारण लोग महात्मा गांधी के भाषण को अच्छी तरह नहीं सुन पाये—शामियाने वग़ैरा, जो सभा के स्थान पर लगाये गये थे सब गिर पड़े थे फिर भी उनके दर्शनों के लिए जनता वहीं डटी रही। सभा स्थल से वे पार्वती आर्य कन्या पाठशाला (आर्य समाज) गये, वहाँ उन्होंने स्त्रियों को सम्बोधित किया। स्त्रियों ने उन्हें धन की थैली व अपने-अपने जेवरात भेंट किये। इस सभा में भी उन्होंने स्त्रियों को विदेशी कपड़े का बहिष्कार करने को कहा और कहा कि वे जेवर पहनना छोड़ दें।
बदायूँ में नई स्फूर्ति
गांधी जी के बदायूँ आगमन से असहयोग आन्दोलन में एक नई स्फूर्ति आ गई। हिन्दू-मुसलमान दोनों कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करने लगे। सार्वजनिक सभाओं में दोनों हिन्दू-मुस्लिम बोलने वाले होते थे। जगह-जगह पर हिन्दू-मुस्लिम एकता के नारे लगाये जाते थे। सभाओं में श्रोतागण भी दोनों सम्प्रदायों के काफी संख्या में उपस्थित होते थे। भाषणों को बड़ी दिलचस्पी से सुनते थे, दोनों सम्प्रदायों में आपसी ताल्लुकात दिनो-दिन अच्छे होते जाते थे।
एलन क्लब में प्रवेश व उसकी विशेष बैठक
वकालत में प्रवेश करने के थोड़े ही दिन बाद मित्रों की राय से रघुवीर सहाय ‘एलन क्लब’ बदायूँ के सदस्य बन गये, जिसमें उन दिनों अधिकारी वर्ग, वकील लोग व दूसरे रईस शाम को टेनिस खेला करते थे। कलेक्टर, डि० जज, कप्तान पुलिस भी आया करते थे। उस समय यह अधिकतर अंग्रेज ही होते थे। जी०के० डार्लिंग कलेक्टर व ओ०एफ० जैंकिन्स डि० जज थे। वह दोनों ही आया करते थे। जब तक रघुवीर सहाय ने असहयोग आन्दोलन में भाग लेना शुरू नहीं किया और वकालत नहीं त्यागी थी तब तक तो बात साधारण रही पर जब असहयोग में खुल्लम खुल्ला भाग लेना शुरू कर दिया और अंग्रेजी कपड़ों का बहिष्कार कर खद्दर की धोती, कुर्ता व टोपी, अचकन पहनकर क्लब में जाना शुरू किया तो अंग्रेज अधिकारी विशेष रूप से टेढ़ी आँख से देखने लगे। जी०के० डार्लिंग ने दूसरे सदस्यों के माध्यम से उनसे कहलाया कि वह क्लब से इस्तीफा दे दें। जब इस्तीफा नहीं दिया और क्लब जाना बन्द नहीं किया तो कलेक्टर ने उसकी एक विशेष बैठक २१ अप्रैल को बुलाई—उसमें अध्यक्ष पद से स्वयं प्रस्ताव रखा जिसका आशय था कि—
(अ) क्लब के हर सदस्य को एक फार्म पर दस्तखत कर यह घोषणा करनी पड़ेगी कि वह असहयोग आन्दोलन को देश हित के लिए नहीं समझता है और न उसका किसी प्रकार उससे सम्बन्ध है।
(ब) जो सदस्य इस समय उपस्थित न हों वह इस घोषणा-पत्र पर दस्तखत कर चेयरमैन के पास तीन दिन के अन्दर भेज दें। घोषणा-पत्र का फार्म रजिस्ट्री से भेजा जायेगा।
(स) जो कोई सदस्य, चाहे वह मीटिंग में उपस्थित हो अथवा रजिस्ट्री से उसके पास फार्म पहुँचने के तीन दिन के अन्दर घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करेगा वह क्लब का सदस्य नहीं रहेगा।
प्रस्ताव पेश करते समय मीटिंग के अलावा तमाम डिप्टी कलेक्टरों के सभी इजलासों के पेशकार भी बुलाये गये थे जो उपस्थित थे।
डार्लिंग का भाषण व एलन क्लब से रघुवीर सहाय का हटाया जाना
अपने भाषण के दौरान उन्होंने कहा कि चन्द शरारत पसन्द लोगों के क्लब में होने के कारण क्लब का वातावरण दूषित हो गया है। उनको किसी भी हालत में नहीं रखा जा सकता। यह मानते हुए कि हर प्रकार के राजनैतिक विचारों के मानने वाले क्लब में रह सकते हैं, उन्होंने कहा कि असहयोग कोई विचारधारा नहीं है वरन् वह मौजूदा सरकार को पलटने का एक षड़यन्त्र है और शान्ति व्यवस्था को कायम रखने में बाधक—उन्होंने यह भी कहा कि इंग्लैण्ड में हर क्लब को यह अधिकार प्राप्त है कि अपने किसी सदस्य को, चाहे वह किसी भी स्थान पर हो, क्लब के नियमों के विरुद्ध कार्य करने पर सदस्यता से पृथक कर सकता है—प्रस्ताव का समर्थन बिल्सी के नवाब साहब ने किया। उसके उपरान्त श्री बाबू राजकुमार वकील ने प्रस्ताव का विरोध जोरदार शब्दों में और तर्क के साथ किया। उन्होंने कहा कि जो इस समय बदायूँ के कलेक्टर हैं वह चार दिन के मेहमान हैं। तबादला होने पर वह यहाँ से चले जायेंगे। क्लब के वातावरण को विशुद्ध नहीं करना चाहिये और न इसमें राजनीति का प्रवेश होना चाहिये। क्लब के अन्दर राजनैतिक विचारों से कोई सरोकार नहीं होना चाहिये। उन्होंने कहा कि क्लब के किसी भी सदस्य को किसी दूसरे सदस्य के राजनैतिक या धार्मिक विचारों को जानने का कोई अधिकार नहीं है—उन्होंने यह भी कहा कि इस घोषणा-पत्र पर सदस्यों का हस्ताक्षर करना उनकी तौहीन करना है। अन्त में उन्होंने कलेक्टर डार्लिंग से प्रस्ताव को वापस लेने का अनुरोध किया। इसके बाद बाबू अमीर चन्द्र जौहरी वकील ने प्रस्ताव का विरोध किया। अन्त में रघुवीर सहाय ने डार्लिंग साहब के उस प्रस्ताव को पेश करने को अनुचित कार्य बताया। उन्होंने डार्लिंग साहब को दोषी ठहराया कि वह क्लब के अन्दर राजनैतिक वातावरण को पैदा कर रहे हैं। उनके भाषण के बाद प्रस्ताव पर मतगणना हुई। केवल चार सदस्य, बाबू राजकुमार, बा० कृष्ण मुरारी, बाबू अमीरचन्द जौहरी व रघुवीर सहाय वकीलों ने विरोध में मत दिया। शेष ने उसके पक्ष में। मतगणना के समय मि० जैन्किन्स डिस्ट्रिक्ट जज अपने स्थान से उठकर बाबू राजकुमार के पास गये और उनसे आग्रह किया कि वह अपना मत विपक्ष में न दें पर बाबू राजकुमार ने उनकी बात नहीं मानी और कहा कि वह ऐसे अनुचित प्रस्ताव का अवश्य विरोध करेंगे। प्रस्ताव के अनुसार यह चारों उस दिन से क्लब के सदस्य नहीं रहे। बाद में श्री बृज लाल भदवार ने उभानी की सहायता से स्थान प्राप्त कर ‘यूनियन क्लब’ के नाम से दूसरा क्लब कायम किया जिसके यह चारों सदस्य बने। वह क्लब अब भी चल रहा है यद्यपि बाबू राजकुमार, बाबू कृष्ण मुरारी और बाबू अमीरचन्द्र जौहरी अब हमारे बीच में नहीं हैं।
अधिकारियों द्वारा व्यवहार व प्रचार कार्य
जहाँ इस प्रकार ब्रिटिश शासन के अधिकारियों की ओर से असहयोग आन्दोलन में भाग लेने वालों के साथ व्यवहार हो रहा था, वहाँ आन्दोलन का प्रचार समस्त जिले की तहसीलों के सदर मुक़ामों तक पहुँच गया था। लक्ष्मण दत्त, रघुवीर सहाय, मुं० मंगलसेन अपने अन्य साथियों के साथ और कभी बाहर से आये व्यक्तियों के साथ वहीं जाकर सभायें करते और भाषण देते। पुलिस का आमतौर पर बुरा व्यवहार रहता—वह उनके लिए किसी प्रकार की सवारी नहीं मिलने देती, उस समय बसें नहीं चलती थीं। इक्के, तांगे से जाना-आना होता था। इक्के, तांगे वाले उनको ले जाने को तैयार नहीं होते थे।
एक अवसर पर लखनऊ से आये कई व्यक्तियों के साथ, जिनमें दो महिलायें भी थीं, रघुवीर सहाय, मुं० मंगलसेन सहसवान, जो बदायूँ से २५ मील है, गये। वहाँ सार्वजनिक सभा में भाषण दिये। रात हो जाने के कारण वहाँ ठहरना पड़ा। पुलिस के आतंक के कारण, अकबराबाद के आर्य समाज में ठहरकर रात गुजारी। प्रातः सभी पैदल उभानी तक, जो वहाँ से १३ मील है, आये फिर रेल पकड़ी और बदायूँ पहुँचे।
रचनात्मक कार्य
प्रचार के काम के साथ-साथ रचनात्मक कार्य भी शुरू कर दिया गया। चौधरी तुलसी राम, जो टीकरी कलां से आकर उभानी में व्यापार में लग गये थे, उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लेना शुरू कर दिया और अपने ही बूते पर खद्दर का उत्पादन शुरू कर दिया। चरखे का कता सूत गांव-गांव जाकर वह बुनकरों द्वारा बुनवाते थे और खद्दर के थान तैयार कराते। उनको बाद में धुलवाकर, नापकर थान पर उसकी नाप व मूल्य अंकित कराते। उनका खद्दर न केवल बदायूँ ही के कांग्रेसी विचारों के लोग खरीदते वरन् बड़ी मात्रा में उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में व अन्य प्रदेशों को भी भेजा जाता था। उत्तर प्रदेश का वह सबसे बड़ा उत्पादन केन्द्र समझा जाता था। बाद को यह खद्दर भंडार गांधी आश्रम मेरठ ने अपने निरीक्षण में ले लिया। उनके साथ सियाराम भी इस केन्द्र में काम करते थे।
१९२६ में जब दूसरी बार गांधी जी बदायूँ पधारे तो सबसे प्रथम वह उभानी पहुँचकर सीधे चौधरी तुलसी राम के खद्दर उत्पादन केन्द्र पर गये। सारी व्यवस्था को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। अपना सारा जीवन चौधरी तुलसी राम ने खद्दर की सेवा में बिताया। इसी कारण तुलसी राम खद्दर वाले के नाम से प्रख्यात हुए।
अमन सभाओं द्वारा प्रचार
प्रचार का काम, जो उस समय जिले में चल रहा था, उससे कलेक्टर बहुत अप्रसन्न थे। अपने सी०आई०डी० विभाग द्वारा उन्हें प्रायः सभी भाषणों की रिपोर्टें मिल जाया करती थी। इस बीच अमन सभाओं की मीटिंग भी सरकारी संरक्षण में होना शुरू हो गई। पुलिस, तहसीलदार, हाकिम परगना, पटवारी, मुखिया, खान बहादुर, खान साहब, राय बहादुर व राय साहब द्वारा शहर व ग्रामीण लोगों को इकट्ठा कर असहयोग आन्दोलन के खिलाफ प्रचार किया जाता था, और सरकार की वफादारी के लिए कहा जाता।
कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रचार रोकने के लिए सबसे पहले कलेक्टर ने अपने हस्ताक्षरों से जाब्ता फौजदारी की धारा १४४ के अन्तर्गत रघुवीर सहाय को बिसौली कैम्प से ११ अप्रेल १९२१ को आदेश जारी किया कि वह जिला बदायूँ में किसी स्थान पर दो महीने के अन्दर कोई भाषण न दें, क्योंकि उस समय तक कांग्रेस की ओर से ऐसे कोई आदेश प्राप्त नहीं हुए थे कि इस प्रकार के सरकारी आदेशों की अवहेलना की जाये या कानून भंग किया जाये इसलिए रघुवीर सहाय ने दो मास तक जिले में आना-जाना व नगर में सभाओं में बोलना बन्द कर दिया। पर उनकी कलम पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया था।
समाचार पत्रों द्वारा लेख प्रकाशन
उन्होंने अब अपना अधिकांश समय अध्ययन व समाचार पत्रों के लिए लेख लिखने में लगाया। ‘विद्यार्थियों से असहयोग आन्दोलन में भाग लेने की अपील’ ६ जून १९२१ वाले ‘इन्डिपेन्डेन्ट’ में, जो इलाहाबाद से प्रकाशित होता था, ‘ग़ैर कानूनी तलाशी पुलिस द्वारा’ १६ जून १९२१ वाले ‘इन्डिपेन्डेन्ट’ में, ‘असहयोग आन्दोलन की प्रगति’ ७ जुलाई १९२१ वाले ‘इन्डिपेन्डेन्ट’ में और ‘शासन की ओर से आतंक’ १० अगस्त वाले ‘इन्डिपेन्डेन्ट’ में प्रकाशित हुए। २ मास की मियाद की समाप्ति पर फिर भाषणों का तांता शुरू हो गया और स्थान-स्थान पर सभायें कर असहयोग के सिद्धान्त, उसकी आवश्यकता, प्रगति व देश के लोगों के कर्तव्य की ओर ध्यान दिलाया जाता था। रघुवीर सहाय व लक्ष्मण दत्त दोनों ही यह आशा करने लगे कि शीघ्र ही गिरफ़्तार कर लिये जायेंगे। कभी कभी औरों के द्वारा इस आशय के समाचार सुनने में आते थे। एक दो बार वह दोनों थाना कोतवाली गये और कोतवाल शहर से आग्रह किया कि वह स्वयं उपस्थित हैं, गिरफ़्तार कर लिया जाये। पर उस समय तक कोई ऐसे आदेश अधिकारियों की ओर से जारी नहीं हुए थे, इस कारण वह गिरफ़्तार नहीं किये गये न अन्य कोई दूसरी गिरफ्तारी शहर या जिले में अमल में आई।
श्री आसफ़ अली की चिट्ठी देहली से
उसी समय मास अक्टूबर या नवम्बर १९२१ में देहली से श्री आसफ़-अली के पास से एक पत्र स्थानीय कांग्रेस कमेटी को प्राप्त हुआ कि वहाँ बदायूँ जिले के एक नवयुवक ‘वदन सिंह’ के नाम से आये हुए हैं। वह कांग्रेस का काम करना चाहते हैं इसलिए उनको बदायूँ वापस भेजा जा रहा है कि वह स्थानीय कांग्रेस के माध्यम से अपना कार्य करें। कुछ समय बाद वह बदायूँ अवश्य आये पर सी०आई०डी० को सूचना पहले ही मिलने के कारण वह बदायूँ पहुँचते ही गिरफ्तार कर लिये गये और जेल भेज दिये गये। बाद को उन पर मुकदमा कायम कर और सजा देकर बरेली जेल भेज दिया गया।
डिवीजनल कानफ्रेन्स बदायूँ में
उधर श्री लक्ष्मण दत्त व रघुवीर सहाय के सुझाव पर डिवीजनल राजनैतिक सम्मेलन का आयोजन बदायूँ में किया गया। कानपुर के डाक्टर मुरारी-लाल ने अध्यक्ष पद ग्रहण किया। लखनऊ के चौधरी खलीकुज़्ज़मां व पंडित हर करन नाथ मिश्रा, बरेली के पंडित द्वारका प्रसाद इत्यादि उसमें भाग लेने को आये। उपस्थिति बेशुमार थी। भाषणों को बड़े ध्यान से सुना गया। इस सम्मेलन के समय भी मि० डार्लिंग कलेक्टर व मि० जैंकिन्स डिस्ट्रिक्ट जज थे।
जैंकिन्स डि० जज द्वारा सभा में गड़बड़ी
एक रात जब सम्मेलन चल रहा था, उपस्थिति भी बड़ी संख्या में थी, तब मि० जैंकिन्स शराब के नशे में धुत्त अपने एक या दो साथियों सहित, जो स्वयं भी शराब के नशे में चूर थे, पन्डाल में घुस आये और गड़बड़ी करने का प्रयत्न किया। पुलिस उस समय हस्तक्षेप करने को तैयार न थी क्योंकि अंग्रेज अफ़सर स्वयं ऐसा कर रहे थे। तब बाबू राजकुमार इत्यादि वकीलों ने, जो वहाँ उपस्थित थे, गड़बड़ी को बचाया और डिस्ट्रिक्ट जज व उनके दूसरे साथियों को समझा बुझाकर पन्डाल से बाहर ले गये। यह वह समय था जब अंग्रेज अधिकारी लोगों में बौखलाहट शुरू होने लगी थी। वह महात्मा गांधी के नाम से, खद्दर की पोशाक से और असहयोग आन्दोलन से चिढ़ने लगे थे।
कलेक्टर डार्लिंग का रेल के इन्जन द्वारा सफ़र
एक दिन प्रचार कार्य के लिए रघुवीर सहाय को उभानी, जो बदायूँ से ५ मील है, रेल द्वारा जाना था। वह दोपहर के समय जो ट्रेन बरेली से आती थी उसको पकड़ने स्टेशन गये और इन्टर क्लास का टिकट खरीद कर गाड़ी के डिब्बे में बैठ गये। उस गाड़ी में इन्जन के पीछे कई माल गाड़ी के डिब्बे लगा करते थे। उनके बाद तीसरे दर्जे के डिब्बे और उसके बाद एक छोटा सा इन्टर क्लास का होता था। उस ट्रेन में फर्स्ट या सेकन्ड क्लास के डिब्बे नहीं लगते थे। थोड़ी देर बाद कलेक्टर स्टेशन पहुँचे। वह भी रेल द्वारा उभानी जा रहे थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि रघुवीर सहाय इन्टर क्लास में बैठे हुए हैं तब उन्होंने बजाय इसके कि वह इन्टर क्लास में जाकर बैठते, इन्जन में ड्राइवर के पास खड़े होकर उभानी तक सफ़र किया। उभानी में रघुवीर सहाय व कलेक्टर साथ-साथ गाड़ी से उतर कर अपने-अपने रास्ते हो लिये।
प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी की बैठक इलाहाबाद में व गिरफ्तारियाँ
अब दिसम्बर १९२१ आ गई। श्री लक्ष्मण दत्त व रघुवीर सहाय, जो दोनों ही उत्तर प्रदेश प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे, इलाहाबाद में प्रान्तीय कांग्रेस की बैठक में भाग लेने के लिए रवाना हो गये। कांग्रेस कमेटी का कार्यालय उन दिनों हीवेट रोड की एक इमारत की पहली मन्जिल पर था। वहाँ सदस्यों की उपस्थिति काफी संख्या में थी। बैठक सायंकाल तक चलती रही। तभी किसी ने कहा कि नीचे पुलिस आ गई है और कार्यालय को चारों ओर से घेर लिया है। थोड़ी देर में एक अंग्रेज कप्तान ऊपर सभा स्थल पर आ गये और कहा कि सभी उपस्थित जन गिरफ़्तार कर लिये गये हैं। पुलिस के सिपाही, गोरे इन्सपेक्टर पुलिस काफी संख्या में वहाँ पहुँच गये थे और एक-एक व्यक्ति का नाम नोट करने लगे। इसमें काफी समय लगा। जिस दिन का इन्तज़ार हो रहा था वह आ गया। अधिकांश लोग, जो वहाँ उपस्थित थे, खुश हुए कि उनकी गिरफ्तारी इस प्रकार सामूहिक रूप से हो रही है। गिरफ्तार किये गये व्यक्तियों में बाबू पुरषोत्तमदास टंडन, डाक्टर मुरारी लाल, डाक्टर जवाहर लाल, बालकृष्ण शर्मा, गनपत सहाय, रघुपति सहाय, जियाराम सक्सेना, पंडित द्वारका प्रसाद इत्यादि ५५ व्यक्ति थे पर सभी प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे। अन्य कई सज्जन गिरफ्तार होने से रह भी गये। गिरफ्तार व्यक्तियों को नीचे सड़क पर लाकर पुलिस वानों में बैठा कर मलाका जेल रात में ही पहुँचा दिया गया। रास्ते भर लोगों की भीड़ लगी हुई थी जो जोर-जोर से नारे लगा रहे थे और महात्मा गांधी की जय पुकार कर रहे थे।
इलाहाबाद मलाका जेल में
जेल में सब व्यक्तियों को एक ही बैरिक में रख दिया गया। रात का समय और जाड़े का मौसम था। सबको २-२ काले खुरदरे कम्बल व एक लोहे का तसला और एक लोहे की छोटी तसली दे दी गई। लेटने के लिए जो सीटें दी गईं वह ऊँची थीं और कम चौड़ी। कभी-कभी लोग सोते में करवट लेते वक्त दो मीटों के बीच नीचे गिर जाया करते थे। अब उतनी ऊँची सीटें जेल में नहीं बनाई जाती हैं। खाना जो रात को दिया गया वह बहुत असन्तोषजनक था। पतली दाल तसले में डालते ही काली पड़ जाती थी। पर सब प्रकार की कठिनाइयाँ होते हुए भी सब एक साथ रहते थे, गाना गाते थे, नारे लगाते थे, आपस में बात चीत करते थे, और अपने दिन हँसी खुशी में बिताते थे। गिरफ्तारी के समय जो सामान सदस्य लोग अपने-अपने साथ लाये थे वह कार्यालय में ही रखा था। पुलिस ने गिरफ्तार व्यक्तियों को सामान लाने की इजाजत नहीं दी।
बगैर वारन्ट गिरफ्तारियाँ व मुकदमों की सुनवाई
गिरफ्तारी किसी वारन्ट द्वारा नहीं की गई थी। न यह बताया गया कि किस कानून की धारा के अन्तर्गत गिरफ्तारी अमल में लाई जा रही है न गिरफ्तार हुए व्यक्तियों में से किसी को यह जानने की इच्छा ही थी। समय बीतता गया। फिर एक दिन बताया गया कि सबों का मुकदमा जेल के अन्दर ही नाक्स मजिस्ट्रेट के सामने पेश होगा। सब लोग एक दूसरी बैरिक में ले जाये गये जहाँ मजिस्ट्रेट के लिए कुर्सी मेज का आयोजन किया गया था। गिरफ्तार व्यक्ति सब जमीन पर बिठाये गये। अंग्रेज कप्तान पुलिस, जिन्होंने कांग्रेस कार्यालय में प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों को गिरफ्तार किया था, उनके बयान के बाद एक के बाद एक से पूछा गया कि उनको कोई बयान देना है या कुछ कहना है? सभी ने बयान देने से इनकार कर दिया। थोड़े समय बाद मजिस्ट्रेट द्वारा हुक्म सुनाया गया कि हर एक व्यक्ति को डेढ़-डेढ़ साल की कैद सख्त व पाँच-पाँच सौ रुपया जुर्माना की सजा दी जाती है। तुरन्त सब लोग तीन टोलियों में तक़सीम कर अलहदा-अलहदा पुलिस वानों द्वारा बाहर भेज दिये गये। जिस टोली में रघुवीर सहाय थे उसमें डा० मुरारी लाल, डा० जवाहर लाल, बाल कृष्ण शर्मा, जगन्नाथ अग्रवाल इत्यादि फाफामऊ रेलवे स्टेशन पर रेल में सवार कराकर बनारस सेन्ट्रल जेल पहुँचा दिये गये।
राजनैतिक बन्दी का रेल से उतर कर खरीदारी करना
रात का समय था। दो हिन्दुस्तानी पुलिस अफसर रेल के डिब्बे में बन्दियों के साथ सफर कर रहे थे। एक स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो बन्दियों में से एक गाड़ी से नीचे उतर गये और प्लेट फार्म पर खरीदारी करने लगे। इतने में गाड़ी चल दी और वह चढ़ने से रह गये। उन्होंने नीचे से ही आवाज दी तब शेष साथियों ने इन्सपेक्टर पुलिस, जो सो गये थे, उन्हें जगाया, जिस पर उन्होंने जंजीर खींच गाड़ी को रुकवाया और प्लेट फार्म वाले बन्दी को डिब्बे में ले लिया।
बनारस जेल व चन्द्र शेखर आजाद से भेंट
सब लोग प्रातः बनारस सेन्ट्रल जेल पहुँचे, जहाँ डाक्टर भगवान दास बनारस वाले ऊपर की मन्जिल में रखे गये थे। उनको नीचे वाले हिस्से में रखे हुए बन्दियों से नहीं मिलने दिया जाता था। बनारस सेन्ट्रल जेल में मिर्जापुर इत्यादि के भी राजनैतिक कैदी बाद को आ गये थे, जो सबके सब फिर बनारस डि० जेल भेजे गये। यहाँ आचार्य कृपालानी, कमलापति त्रिपाठी इत्यादि पहले से मौजूद थे। एक दिन चन्द्रशेखर आजाद, जो उस समय एक नवयुवक थे और बनारस नगर में कांग्रेस का कार्य करते थे, बेतों की सजा प्राप्त करने के लिए बनारस सेन्ट्रल जेल भेजे गये। बेंत लग जाने के बाद वह छोड़ दिये गये। वापसी पर वह डि० जेल में आचार्य कृपालानी से मिलने आये और उन्होंने बेंतों की सजा का हाल हँसते-हँसते सुनाया, और बेंतों के प्रहार से जो जख्म हो गये थे उनको दिखाया। चन्द्र शेखर की उस समय की वार्ता सुनकर सभी को यह लगा कि आगे चलकर यह नवयुवक ब्रिटिश सरकार का सबसे भयंकर विरोधी बनेगा, इतिहास ने बताया कि ऐसा ही हुआ।
लखनऊ डिस्ट्रिक्ट जेल
बनारस डि० जेल में थोड़े समय रहने के पश्चात् रघुवीर सहाय व उनके बैच के सभी साथी लखनऊ डिस्ट्रिक्ट जेल भेज दिये गये, जो उत्तर प्रदेश के राजनैतिक पीड़ितों की जेल बनाई गई थी। यहाँ पंडित मोती लाल नेहरू पहले से ही मौजूद थे। वह अलहदा एक बैरिक में रखे गये थे। पं० जवाहर लाल नेहरू, देवदास गांधी, महादेव भाई देसाई, और अन्य लोग इसी जेल में रखे गये थे। सभी बैरिकें खचाखच राजनैतिक बन्दियों से भरी हुई थीं। थोड़े दिनों बाद आगरा व नैनी सेन्ट्रल जेलों को जो बैच भेजे गये थे वह भी लखनऊ पहुँचा दिये गये।
जेल में व्यवहार
इस बीच काफी समय गुजर चुका था। बनारस सेन्ट्रल जेल, बनारस डिस्ट्रिक्ट व लखनऊ डिस्ट्रिक्ट जेल के व्यवहार में बड़ा अन्तर था। यद्यपि शुरू में सरकार की ओर से खाने पीने की व्यवस्था सन्तोषजनक थी पर आखिर में लखनऊ जेल में केवल तीन आने प्रतिदिन के हिसाब से भोजन के लिए प्रति बन्दी दिये जाते थे। इसके अतिरिक्त यदि बन्दी चाहे तो वह अपने पैसे से खाद्य पदार्थ मंगाये।
पंडित जवाहर लाल नेहरू का साथ
पं० जवाहर लाल नेहरू के साथ रहने पर लोगों के ऊपर काफी प्रभाव पड़ता था कि वह कैसा सादा जीवन व्यतीत करते हैं और जेल की सभी असुविधाओं को खुशी से बरदाश्त करते हैं। उनके साथ रहने वाले कभी भी इसको नहीं भूलेंगे। रघुवीर सहाय को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि वह जेल के उसी बैरिक में और उसी सीट के पास रखे गये थे जहाँ पंडित नेहरू का स्थान था।
चौरी चौरा कांड
लखनऊ जेल में जब रघुवीर सहाय अन्य राजनैतिक बन्दियों सहित बन्द थे तभी चौरी चौरा काण्ड की खबर पहुँची और उसके तुरन्त बाद महात्मा गांधी द्वारा आन्दोलन को समाप्त करने की घोषणा। इस घोषणा के कारण सभी बन्दियों को बड़ा दुख हुआ कि इतनी तीव्र गति से बढ़ते हुए आन्दोलन को इस प्रकार रोक दिया गया। पर सब यह भी महसूस करते थे कि महात्मा गांधी, जो आन्दोलन के कर्णधार हैं, वही सही निर्णय ले सकते थे, अन्य कोई नहीं। समय कटने लगा। उसके बाद जब देश में शान्ति का वातावरण फिर से आने लगा तब ब्रिटिश सरकार ने लगभग सभी राजनैतिक बन्दियों को जनवरी १९२३ के अन्त में रिहा कर दिया। जेल से रिहा होने के पश्चात लखनऊ जेल के सभी बन्दी छेदा लाल धर्मशाला में एकत्रित हुए, जहाँ एक सामूहिक फोटो लिया गया। उसकी एक प्रति अभी भी रघुवीर सहाय के पास है।
जिले में गिरफ्तारियों की धूम
इधर रघुवीर सहाय व श्री लक्ष्मण दत्त की इलाहाबाद में गिरफ्तारी के बाद बदायूँ जिले में भी गिरफ्तारियों का ताँता लग गया। मास्टर जंग बहादुर, मास्टर बंशी मनोहर, गंगाराम, कु० रुकम सिंह, इदरीस खां, मुन्शी मंगल सेन, चौ० तुलसी राम, जयगोपाल, इत्यादि बहुत से कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिये गये। इन सबों ने असहयोग आन्दोलन के प्रचार में सक्रिय भाग लिया था और अपना सारा समय इसके लिए देते रहे थे। उन पर तरह-तरह के मुकदमे चलाकर लम्बी-लम्बी सजायें देकर बाहर जेलों में भेज दिया गया।
‘सी’ क्लास बन्दियों से मशक्कत
इनके अलावा गिरफ्तारियां सामूहिक रूप से उस समय की जाती थीं, जब तहसीलों के सदर मुकामों पर, कचहरी के सामने वालिन्टियरों द्वारा प्रदर्शन किये जाते थे। उन सभी गिरफ्तार शुदा लोगों को, जो बदायूँ नगर या जिले के अन्य भागों से गिरफ्तार किये गये थे, ‘सी’ क्लास का बन्दी बनाकर रखा गया था। सबको ही मशक्कत करनी पड़ती थी। चक्की पर आटा पीसना, पुल से पानी खींचना, कोल्हू चलाना आदि मशक्कतें दी जाती थीं। पर इन सब कठिनाइयों के बावजूद सभी खुश व सन्तुष्ट रहते थे और हँस-हँस कर अपने जेल के दिन बिताते थे।
लखनऊ जेल से छूटने के पश्चात बदायूँ आते हुए रघुवीर सहाय बरेली रुके और वहीं डिस्ट्रिक्ट जेल पर मास्टर जंग बहादुर व अन्य बदायूँ के साथियों से भेंट की और उन सबको प्रसन्नचित पाया। थोड़े दिन बाद वे सब भी रिहा होकर बदायूँ आ गये।