अध्याय 3 / 11
स्थानीय निकायों व कौन्सिल प्रवेश
1924–29
यह पुस्तक १९७४ में हिंदी में लिखी गई थी और यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत है जैसे प्रकाशित हुई थी — इसका अनुवाद नहीं किया गया है। मेनू व नेविगेशन भाषा बदलते हैं; पुस्तक का पाठ नहीं बदलता।
जनवरी १९२३ के समय का वातावरण
असहयोग और सिविल नाफ़रमानी के आन्दोलन उस समय तक समाप्त हो चुके थे जब श्री लक्ष्मण दत्त व रघुवीर सहाय जनवरी १९२३ के अन्त में लखनऊ जेल से रिहा होकर बदायूँ पहुँचे। उनके आने के बाद दूसरे और सत्याग्रही जो जेलों में बन्द कर दिये गये थे, वह भी छूट कर आ गये। वातावरण उस समय सामान्य-सा प्रतीत होने लगा। कोई राजनैतिक हलचल या उथल पुथल नज़र नहीं आती थी।
चौरी-चौरा काण्ड के पश्चात
इस बीच जब ये लोग जेलों के अन्दर थे तब चौरी चौरा काण्ड गोरखपुर जिले में ५ फरवरी १९२२ को हो चुका था। इससे पहले एक या दो और घटनायें हो चुकी थीं जिनके कारण महात्मा गांधी ने १२ फरवरी १९२२ को बारदौली प्रस्ताव के अनुसार सामूहिक रूप में सिविल नाफ़रमानी के आन्दोलन को बन्द कर दिया। गांधी जी को भी सरकार ने १३ मार्च १९२२ को गिरफ्तार कर और मुकदमा चलाकर ६ साल के लिये जेल भेज दिया। तदुपरान्त अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने अपनी २२ जून वाली बैठक में एक कमेटी का गठन किया जो सारे देश में भ्रमण कर पता लगाये कि कांग्रेस का असहयोग व सिविल नाफ़रमानी का आन्दोलन किस प्रकार चला है और उसमें किसी परिवर्तन की तो आवश्यकता नहीं है।
सिविल नाफ़रमानी जांच कमेटी
इसके सदस्य थे :
पं० मोती लाल नेहरू
हकीम अजमल ख़ाँ
श्री सी० राज गोपालाचार्य
डाक्टर एम० ए० अन्सारी
श्री बी० जे० पटेल
सेठ जमुना लाल बजाज
सेठ ओ० एम० एच० जे० छोटानी
बाद को श्री एस० कस्तूरी रंगा एयनगर भी इसके सदस्य बना लिये गये।
कमेटी की मुख्य सिफारिशें
सारे देश में भ्रमण करने के उपरान्त कमेटी ने अपनी रिपोर्ट २० अक्तूबर १९२२ को दे दी। कमेटी की मुख्य सिफारिशें इस प्रकार थीं कि कांग्रेस चुनाव में भाग ले और अपने प्रतिनिधियों को विधान सभाओं में भेजे। इसमें केन्द्रीय एसेम्बली भी शामिल है।
दूसरे कांग्रेस स्थानीय निकायों में (म्युनिसिपलटी व डिस्ट्रिक्ट बोर्ड) में अपने प्रतिनिधियों को भेजे और वह वहाँ रचनात्मक कार्य को बढ़ावा दे।
कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव के लिए
लक्ष्मण दत्त व रघुवीर सहाय के बदायूँ पहुँचने के पश्चात यह तय पाया कि आगामी बदायूँ म्युनिसिपलिटी के चुनाव, जो शीघ्र ही होने वाले हैं, उनमें कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार खड़े किये जायें। तदनुसार रघुवीर सहाय, श्री लक्ष्मण दत्त, बाबू राज कुमार वकील, तीन नान-मुसलिम सीटों से खड़े किये गये। तीनों ही चुनाव में विजयी हुए। यद्यपि उनका कड़ा विरोध किया गया था। मुसलमानों में कोई कांग्रेस टिकट पर खड़ा नहीं हुआ था, जिस प्रकार सदस्य पहले चुने जाते थे, वैसे ही फिर चुने गये, यानी जमींदार, रईस, पेंशनयाफ्ता या खिताबयाफ्ता लोगों में से। सदस्यों ने एक ऐसे मुसलमान को सर्वसम्मति से चेयरमैन के पद पर चुन लिया जो स्वयं सदस्य नहीं था।
कलेक्टर का विरोध
चुनाव से पहले यह आम चर्चा चल रही थी कि स्थानीय कलेक्टर श्री बी० कैल्डर, आई० सी० एस०, कांग्रेस के उम्मीदवारों के विरोध में अपना मत प्रगट कर रहे हैं और लोगों को उनके विरुद्ध राय देने के लिए कह रहे हैं। इस पर रघुवीर सहाय ने उन्हें पत्र लिखकर यह जानना चाहा कि ऐसी चर्चा पब्लिक में उनके बारे में चल रही है उसमें कोई तथ्य है या वह निराधार है। कलेक्टर महोदय ने साफ जवाब न देकर उनको अपने निवास स्थान पर मिलने के लिए बुलाया। रघुवीर सहाय कलेक्टर से मिलने नहीं गये, वरन् उनको यह लिख दिया कि जब वह यह कहने को तैयार नहीं हैं कि खबर निराधार है तो उनको यही विश्वास करना होगा कि वह सत्य है। कलेक्टर का मत होते हुए भी मतदाताओं ने, जिनमें अधिकांश पढ़े लिखे लोग थे, वकील, मुख्तार, सरकारी कर्मचारी, उन्होंने रघुवीर सहाय के पक्ष में मत देकर उनको विजयी बनाया। मतदाताओं ने रघुवीर सहाय व श्री लक्ष्मण दत्त को उनकी सेवा के आधार पर विश्वास करके मत दिये थे।
बाबू राज कुमार स्वयं एक बड़े विख्यात अनुभवी वकील थे और कांग्रेस के सहायकों में से थे। बदायूँ के इतिहास में नान-मुसलिम में से इससे पहले शिक्षित लोग या पब्लिक लाइफ में हिस्सा लेने वालों में से कभी म्युनिसिपलिटी में चुनकर नहीं भेजे गये थे। सब लोग यह आशा करते थे कि वह म्युनिसिपलिटी का सुधार करेंगे और इनके वहाँ रहने से पब्लिक सेवाओं में काफी वृद्धि होगी, पर ऐसा नहीं हुआ।
म्युनिसिपलिटी के हालचाल देखकर जहाँ हर प्रश्न साम्प्रदायिक दृष्टि से देखा जाया करता था और तै किया जाता था, श्री लक्ष्मण दत्त थोड़े ही दिन बाद इस्तीफा देकर चले गये और काशी विद्यापीठ में एक स्थान ग्रहण कर लिया। बाबू राज कुमार कुछ दिनों बाद बीमार पड़ गये और उनका स्वर्गवास हो गया। अपने मरने से पहले वह जब तक म्युनिसिपलिटी में आते थे, बड़े दुखित रहते थे और वहाँ का वातावरण उनको बिल्कुल पसन्द नहीं था। म्युनिसिपलिटी के सदस्य अपने बहुमत का दुरुपयोग करते थे। रिक्त हुए स्थानों पर जो सदस्य चुनकर आये वह भी रईस, ज़मींदार लोगों में से थे और जो कभी भी सही राय कायम नहीं कर पाते थे। अधिकतर यह लोग भी बहुमत वालों का ही साथ देते थे। रघुवीर सहाय इन सब बातों के होते हुए भी वहाँ डटे रहे और अपनी राय न्याय संगत, पक्षपात रहित व पब्लिक के हित में देते रहे। पर उनकी बात कभी मानी नहीं जाती थी।
समाचार-पत्रों द्वारा म्युनिसिपलटी के कार्यों का प्रचार
इसलिए रघुवीर सहाय म्युनिसिपलिटी के सभी उन प्रश्नों पर, जब वह म्युनिसिपलिटी के अन्दर असफल होते थे तब उनको लेकर स्थानीय उर्दू “ज़ुलकर-नैन” अथवा अंग्रेजी के “लीडर”, “हिन्दुस्तान टाइम्स”, “इन्डिपेन्डेन्ट”, “अमृत बाज़ार पत्रिका”, और ‘आई० डी० टी०’ में समय-समय पर लेख लिखकर भेजते, म्युनिसिपलिटी के अन्दर के रहस्य खोलते और उन सब के लिए कलेक्टर, जो उस समय एम० एच० बी० नेदरसोल, आई० सी० एस० थे, उनको ज़िम्मेदार ठहराते। उनका विचार था कि अगर कलेक्टर निष्पक्ष रूप से सब मामलों को देखे तो यह लोग अपने बहुमत का दुरुपयोग न करें और जो धांधली म्युनिसिपलिटी में हो रही है वह न होने पाये।
चेयरमैन का इस्तीफ़ा
उसी समय रघुवीर सहाय ने चेयरमैन के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव उपस्थित कर दिया। वह जानते थे कि बहुमत चेयरमैन के पक्ष में था फिर भी उन्होंने अपने प्रस्ताव को रखा, जो गिर गया। यह सब कुछ होते हुए भी अन्त में एक ऐसा समय आ गया जब नेदरसोल कलेक्टर को यह विश्वास हो गया कि रघुवीर सहाय का पक्ष न्याय संगत है और चेयरमैन उक्त पद के बिल्कुल अयोग्य है। केवल अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग कर अविश्वास प्रस्ताव गिर जाने के बावजूद नेदरसोल ने अधिकांश सदस्यों से लिखित प्रार्थना-पत्र हासिल कर चेयरमैन की अलहदगी के लिए कमिश्नर को लिख दिया। चेयरमैन ने तुरन्त इस्तीफा दे दिया।
पृथक निर्वाचन पद्धति के आधार पर चुनाव
रघुवीर सहाय ने अपनी सदस्यता के दौरान यह भी महसूस किया कि पृथक निर्वाचन के आधार पर चुने हुए होने के कारण अधिकांश सदस्यों का रवैया साम्प्रदायिक बन जाता है। अतः यह नितान्त आवश्यक है कि संयुक्त निर्वाचन पद्धति द्वारा चुनाव कराये जायें।
अलीगढ़ कानफ्रेन्स
अलीगढ़ में पण्डित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में जब प्रदेश म्युनिसिपलटी कानफ्रेन्स, जिसके स्वागताध्यक्ष अब्दुल मजीद ख्वाजा थे, हुई तब उसमें रघुवीर सहाय ने पृथक निर्वाचन पद्धति को हटाकर संयुक्त निर्वाचन के आधार पर चुनाव करने का प्रस्ताव पेश किया। पर उस समय नेतागण ऐसा प्रस्ताव उचित नहीं समझते थे, इस कारण प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। पर अपने अनुभव के आधार पर रघुवीर सहाय ने इस निर्वाचन पद्धति का सदा विरोध किया और समय समय पर इस बारे में लेख लिखकर समाचार पत्रों में प्रकाशित कराते रहे। बदायूँ म्युनिसिपल बोर्ड की ही निराली हालत नहीं थी, उस समय उत्तर प्रदेश के अधिकांश बोर्डों में ऐसा ही वातावरण फैला हुआ था।
रघुवीर सहाय का फैसला
बदायूँ म्युनिसिपल बोर्ड के अनुभवों के आधार पर रघुवीर सहाय ने यह निश्चय कर लिया कि आइन्दा वह कभी म्युनिसिपलिटी के लिए चुनाव में नहीं खड़े होंगे।
विधान सभाओं का चुनाव
उधर विधान सभाओं में भी जाने के प्रश्न पर कांग्रेस क्षेत्रों में विचार तेजी से चल पड़ा था। सिविल नाफ़रमानी जांच कमेटी की रिपोर्ट व उसकी सिफारिशें प्रकाशित हो चुकी थीं। गया कानफ्रेन्स ने दिसम्बर १९२२ में इस रिपोर्ट पर विचार भी किया। एक दल इन सिफारिशों के पक्ष में तो दूसरा इनके विरोध में खड़ा हो गया। इस प्रश्न को अन्तिम रूप देने के लिए देहली में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अध्यक्षता में विशेष अधिवेशन बुलाया गया जो सितम्बर १९२३ में हुआ। रघुवीर सहाय बदायूँ से इस सेशन में शरीक हुए। कांग्रेस ने यह निर्णय किया कि कांग्रेस जनों को विधान सभाओं व केन्द्रीय एसेम्बली में जाने की अनुमति दी जाये और कांग्रेस की तरफ से चुनाव लड़े जायें।
चौ० बदन सिंह की नामज़दगी
इसी निर्णय के अनुसार पण्डित मोती लाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए बदायूँ क्षेत्र से चौधरी बदन सिंह को चुनाव लड़ने के लिए नामज़द किया। तब रघुवीर सहाय व श्री लक्ष्मण दत्त, जिनको डेढ़-डेढ़ साल की सजायें १९२२ में हो चुकी थीं, उस समय के कानून के अनुसार चुनाव के लिए खड़े नहीं हो सकते थे।
उनके विरोध में उम्मीदवार
चौधरी बदन सिंह के मुक़ाबले में राय बहादुर बृजलाल भदवार और डाक्टर रामचरन लाल, रिटायर्ड सिविल सर्जन खड़े हुए। यह दोनों ही विख्यात पुरुषों में से थे और आर्थिक दृष्टि से इन दोनों का और चौधरी बदन सिंह का कोई मुक़ाबला नहीं था। बदायूँ का पूरा जिला काउन्सिल के चुनाव के लिए एक क्षेत्र था, यद्यपि निर्वाचन की पद्धति पृथक निर्वाचन की थी। समस्त जिले के कांग्रेसी विचार के लोगों ने चौधरी बदन सिंह का समर्थन किया और मतों के प्राप्त करने में उनको मदद दी। जिले की सारी प्रभावशाली शक्तियाँ उस समय रायबहादुर बृजलाल भदवार तथा डाक्टर रामचरन लाल के पक्ष में काम कर रही थीं। अधिकारी गण खुल्लमखुल्ला कांग्रेस के विरोध में काम कर रहे थे। यह सब होते हुए भी चौधरी बदन सिंह सफल हुए और अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी को १० वोटों से हराया। आगे चलकर चौधरी बदन सिंह, स्वराज्य पार्टी से पृथक हो गये और १९२६ के चुनाव में वह फिर स्वतंत्र रूप से खड़े हुए और विजयी हुए।
डिस्ट्रिक्ट बोर्डों के चुनाव व चौधरी बदन सिंह का उसमें भाग
डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चुनाव भी उस समय होने वाले थे। चौधरी बदन सिंह ने उसमें भाग लिया और अपने लिए एक स्थान प्राप्त कर लिया। पर उनके चुनाव के विरुद्ध इलेक्शन पिटीशन दायर हुई जिसकी सुनवाई डिस्ट्रिक्ट जज के सामने हुई। इसमें भ्रष्टाचार आदि के आरोप लगाये गये थे। डिस्ट्रिक्ट जज ने पिटीशन मन्जूर कर उनका डिस्ट्रिक्ट बोर्ड वाला स्थान रिक्त घोषित कर दिया। उसके ही फलस्वरूप उनके खिलाफ फौजदारी की अदालत में मुकदमा चलाया गया जिसमें बाद को इलाहाबाद के उच्च न्यायालय से उनको जेल की सजा दी गई जिसके कारण उत्तर प्रदेश कौन्सिल से भी उनका स्थान रिक्त कर दिया गया।
उ० प्र० कौन्सिल के लिए पुनः निर्वाचन
चौधरी बदन सिंह के इस तरह से कौन्सिल से पृथक हो जाने के पश्चात कौन्सिल सीट का पुनः निर्वाचन हुआ। राय बहादुर बृजलाल भदवार व ठाकुर हाकिम सिंह दोनों ही इस स्थान के लिए खड़े हुए। दोनों ही बड़े प्रभावशाली व्यक्ति थे।
उम्मीदवारों द्वारा प्रचार व निर्णय
सारे जिले में गश्त लगाकर इन्होंने अपना प्रचार कार्य प्रारम्भ कर दिया। नामज़दगी के थोड़े ही दिन पहले दोनों दल अकस्मात एक स्थान पर इकट्ठे हो गये और आपस में बातचीत करने लगे। स्थान पन्डित गोपालराम गूरा वालों का था, जो दोनों से भलीभांति परिचित थे और उस समय स्वयं उपस्थित थे। दोनों पक्ष अपने अपने लिए पंडित जी का सहयोग प्राप्त करने के इच्छुक थे। पर बातों ने उस समय ऐसा मोड़ ले लिया जिसके फलस्वरूप सर्वसम्मति से यह निश्चय हुआ कि दोनों में से एक भी खड़ा न रहे बल्कि तीसरे व्यक्ति को खड़ा कर उसे कामयाब बनाया जाये। उसी निश्चय के अनुसार यह तय पाया कि रघुवीर सहाय, जो उस समय वहाँ उपस्थित नहीं थे, को ही खड़ा किया जाये और उनको सफल बनाया जाये।
रघुवीर सहाय का बिला मुकाबला चुनाव
तदोपरान्त रघुवीर सहाय ने अपना नामज़दगी का पर्चा भरा और मि० डावस आई० सी० एस० कलेक्टर के सम्मुख दाखिल किया। कलेक्टर महोदय ने उसकी जांच के बाद रघुवीर सहाय को बिला मुकाबला कौन्सिल का सदस्य घोषित कर दिया। रघुवीर सहाय इस स्थान पर स्वराज्य पार्टी के सदस्य के रूप में १९२९ के अन्त तक रहे। जब लाहौर कांग्रेस ने, जो पण्डित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुई, पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रस्ताव पास कर दिया और उसमें यह भी निश्चय हुआ कि जो लोग स्वराज्य पार्टी की ओर से विधान सभाओं व केन्द्रीय असेम्बली में सदस्य चुने गये हैं, अपने अपने स्थानों से त्याग पत्र दे दें, तब रघुवीर सहाय ने भी उत्तर प्रदेश विधान सभा से अपना त्याग पत्र दे दिया।
जिला राजनैतिक कानफ्रेन्स
१९२३ के अन्त में या १९२४ के प्रारम्भ में बदायूँ जिला राजनैतिक कानफ्रेन्स के लिए रघुवीर सहाय ने स्वयं अलीगढ़ जाकर मौलाना शौकत अली को अध्यक्ष पद के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने निमंत्रण इस शर्त पर स्वीकार कर लिया कि जब बदायूँ आयें तो उनको रसखीर खिलाई जाये। रघुवीर सहाय ने यह शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली। पर किसी विशेष कारणवश वह कानफ्रेन्स में न आ सके। लेकिन उन्होंने पण्डित जवाहर लाल नेहरू को तैयार कर बदायूँ भेज दिया। बदायूँ के लोगों को यह समाचार मिलने पर अत्यन्त खुशी हुई और पण्डित नेहरू के आगमन पर उनका हार्दिक स्वागत किया। कानफ्रेन्स में पण्डित जी ने अपना भाषण दिया, जिसको सुनकर लोग अत्यन्त प्रभावित हुए। उनके दर्शनों की लालसा तो पहले से ही थी क्योंकि उनका नाम सुन चुके थे और जानते थे कि मोती लाल के यह सच्चे जवाहर ही हैं। जवाहर लाल जी के आने से बदायूँ में एक नई चेतना उत्पन्न हुई।
१९२४ एक महत्वपूर्ण वर्ष—साम्प्रदायिक दंगे
देश के इतिहास में १९२४ एक विशेष महत्व रखता है। जहाँ असहयोग आन्दोलन के प्रारम्भ से ही हिन्दू मुसलमानों के आपसी सम्बन्ध न केवल अच्छे ही वरन् सुदृढ़ होने लगे थे, साम्प्रदायिक दंगे न होने के बराबर रह गये थे। आन्दोलन के दौरान हिन्दू मुसलमान कन्धे से कन्धा लगाकर भाग ले रहे थे और अपना योगदान दे रहे थे। पर आन्दोलन की समाप्ति पर—मोपला काण्ड पहले ही हो चुका था—स्थिति बिल्कुल बदल गई। देश में साम्प्रदायिक दंगों का तांता-जैसा लग गया। दिल्ली, गुलबर्गा, नागपुर, लखनऊ, शाहजहाँपुर, इलाहाबाद, जबलपुर और अन्त में कोहाट में जो दंगे हुए उनसे सारे देश का वातावरण ही दूषित हो गया।
महात्मा गांधी की रिहाई व उनकी प्रतिक्रिया
महात्मा गांधी इस बीच अपेनडीसाइटीज़ के आपरेशन के बाद ५ फरवरी १९२४ को रिहा कर दिये गये। उन्होंने इन साम्प्रदायिक दंगों के लिए अपने को दोषी ठहराया और फलस्वरूप २१ दिन के उपवास का निश्चय किया जो उन्होंने मौलाना मोहम्मद अली के निवास स्थान पर देहली में, जहाँ वह ठहरे हुए थे, आरम्भ किया। उनके अनशन के दौरान समस्त सम्प्रदायों के नेताओं ने एकत्रित होकर एक एकता परिषद में भाग लिया और साम्प्रदायिक एकता कायम करने के सम्बन्ध में अनेक निर्णय लिये। बदायूँ से रघुवीर सहाय व मुंशी मंगलसेन इस सम्मेलन में भाग लेने गये।
शुद्धि, संगठन व तबलीग़
पर स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखाई पड़ा। बदायूँ पर भी इसका असर पड़ा। समस्त उत्तर भारत विशेष कर उत्तर प्रदेश में शुद्धि, संगठन व तबलीग़ आन्दोलन तेजी से चल पड़े। कांग्रेस के अनेक नेतागण व अनुयायी इसमें खुल्लम खुल्ला भाग लेने लगे। इसी प्रकार मुसलमानों के चोटी के नेता भी तबलीग़ में भाग लेने लगे। बदायूँ में मौलाना अब्दुल माजिद और इदरीस खां ने तबलीग़ का काम जोरों से शुरू कर दिया। उधर चौधरी बदन सिंह ने शुद्धि व संगठन का काम अपने हाथों में ले लिया। कांग्रेस का रचनात्मक काम फीका पड़ गया और एकता जैसी चीज को बड़ी ठेस पहुँची।
तबलीग़ कानफ्रेन्स
मौलाना अब्दुल माजिद ने, जो कुछ समय पहले गांधी जी के बहुत निकट आ गये थे और उन्हीं के आग्रह पर वह बदायूँ ११ मार्च, १९२१ को पधारे, अब बिलकुल कांग्रेस से पृथक होकर तबलीग़ कानफ्रेन्स का आयोजन किया जिसकी सदारत श्री सर अब्दुल रहीम ने की। यहाँ के मुसलमानों की आशाओं के विरुद्ध सर अब्दुल रहीम ने तबलीग़ की अलोचना करते हुए कहा कि इस्लाम के महत्व को उसमें कमज़ोर ख्याल के मुसलमानों को शामिल करके नहीं कायम किया जा सकता। उन्होंने मुसलमानों की आन्तरिक कमज़ोरियों की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि मुसलमानों के नेताओं को उनके दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये। रघुवीर सहाय ने उनके इस भाषण पर टिप्पणी कर एक लम्बा लेख “लीडर” अखबार को भेजा जो १३ अक्टूबर १९२७ के अंक में प्रकाशित हुआ।
ख्वाजा हसन निजामी की गांधी जी से भेंट—भिरावटी की मस्जिद
महात्मा गांधी के अनशन के दौरान एक दिन देहली के ख्वाजा हसन निजामी उनसे मिलने गये और तब उनसे कहा कि बदायूँ जिले में भिरावटी गाँव में मुसलमानों की मस्जिद पर हिन्दुओं ने जबरजस्ती कब्जा कर लिया है और मुसलमानों को इस्तेमाल नहीं करने देते हैं। गांधी जी ने यह बात पंडित जवाहर लाल नेहरू को बताई और उनसे कहा कि वह शीघ्र ही इस मामले की जांच करायें। नेहरू जी ने रघुवीर सहाय को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि रघुवीर सहाय तुरन्त भिरावटी जाकर इस मामले की जांच करें और अपनी रिपोर्ट उनके पास भेजें, जिसे वह स्वयं गांधी जी को दे देंगे। इस पत्र के पाने पर रघुवीर सहाय भिरावटी रवाना हो गये। भिरावटी तहसील गुन्नौर में जिला बुलन्दशहर के पास स्थित है। उनके साथ बरेली के पंडित द्वारका प्रसाद भी गये। वहाँ पहुँचकर उन दोनों ने कस्बे की आबादी में घूमकर देखा तो पुरानी ईंटों की बनी एक छोटी सी मस्जिद नजर आई, जिसका गुम्बद बिल्कुल टूटा हुआ था और देखने से यह मालूम पड़ता था कि वह कभी इस्तेमाल नहीं की गई है। उसके चारों तरफ हिन्दुओं की मकानात व दुकानें थीं। कहीं भी मुसलमानों की आबादी नज़र नहीं आती थी। तलाश करने पर जिस जगह मुसलमान रहते थे वहाँ गये। वह जगह बस्ती से काफी फासले पर थी। सब मुसलमान एक साथ ही रहते थे और उनकी अलहदा एक मस्जिद भी बनी हुई थी जो उन्होंने दिखाई। उनसे बातचीत करने पर मालूम हुआ कि वह कभी भिरावटी गाँव की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने नहीं गये।
फ़क़ीर की दुआ के कारण औलाद
तहक़ीकात से मालूम हुआ कि यह मस्जिद जो हिन्दुओं की आबादी में बनी हुई थी उसको पुराने ज़माने में चौधरी छिद्दू सिंह ने एक मुसलमान फकीर के कहने पर अपने मकान के करीब में ही बनवा दिया था। फकीर की दुआ से चौधरी छिद्दू सिंह के लड़का पैदा हुआ था। जबकि उससे पहले उनकी कोई औलाद नहीं हुई। पटवारी के कागजात में मस्जिद के सामने खाना कैफियत में लिखा है—“तामीर करदा चौधरी छिद्दू सिंह”। रघुवीर सहाय ने अपनी रिपोर्ट में यह सब बातें दर्ज कर दीं और कहा कि मस्जिद हिन्दुओं की बस्ती में हिन्दुओं की ही बनवाई हुई है। उन्हीं के कब्जे में है। इसको मुसलमानों ने कभी इस्तेमाल नहीं किया है अतः उनकी राय में यह हिन्दुओं के ही कब्जे में रहना चाहिये। रिपोर्ट को पंडित जवाहर लाल नेहरू के पास भेज दिया गया। उन्होंने उसे गांधी जी को दे दिया। उक्त रिपोर्ट के महात्मा गांधी के पास पहुँचने के बाद महादेव भाई ने रघुवीर सहाय को गांधी जी से मिलने के लिए लिखा। जब रघुवीर सहाय १९२४ के दिसम्बर में बेलगांव कांग्रेस अधिवेशन में, जिसके स्वंय गांधी जी अध्यक्ष थे, शामिल होने गये तब उन्होंने गांधी जी से भेंट की। गांधी जी ने तब उन्हें बताया कि वह उनकी भेजी हुई रिपोर्ट पढ़ चुके हैं और उनसे बिल्कुल सहमत हैं। वह मस्जिद अब भी हिन्दुओं के कब्जे में है। भिरावटी के बाहर मुसलमानों द्वारा इसी मस्जिद के संबंध में अदालत सिविल जज के यहाँ मुकदमा भी दायर किया गया था जिसमें वह नाकामयाब रहे।
बदायूँ में जबरदस्त सैलाब व सहायता कमेटी का गठन
१९२४ में ही बदायूँ में बड़े जबरदस्त सैलाब आये और जिले के चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देने लगा। शहर के अन्दर भी पानी घुस आया और जो निचली जमीनें थीं उनमें पानी भर गया। देहातों में तो पानी के हर जगह भर जाने के कारण मनुष्य व पशु दोनों ही संकट में पड़ गये। रेल की पटरी सब खड़ी की खड़ी रह गई। उसके नीचे की मिट्टी सब बह गई। पटरियाँ स्लीपरों पर टंगी हुई दिखाई देती थीं। सैलाब से जो स्थिति उत्पन्न हो गई थी उसको देखकर एक गैर सरकारी सहायता कमेटी की स्थापना की गई जिसके अध्यक्ष खान बहादुर मौलवी फ़सीहउद्दीन एम० एल० सी० व मंत्री श्री रघुवीर सहाय व मौलवी इकराम आलम वकील बनाये गये। कमेटी के ओहदेदारान व सदस्यों ने जिले के सभी भागों में जाकर स्थिति का मूल्यांकन किया। उन्होंने बिनावर, जो उत्तर में अरल नदी के निकट है, वहाँ जाकर निकटवर्ती गांवों को देखा। उसके पश्चात सहसवान गये, जहाँ सारा कस्बा ही पानी में डूब गया था। दूसरे दिन कछला की ओर जिले की दक्खिन दिशा में गये। बड़ी गंगा के किनारे बसे गांवों को देखा। इसके बाद दातागंज व गुन्नौर भी गये और जहाँ-जहाँ जिस सहायता की जरूरत देखी वह दी गई। कमेटी की ओर से धन संग्रह किया गया और कम्बल आदि भी इकट्ठे किये गये जिनका वितरण जरूरतमन्दों में किया गया। यद्यपि नेदरसोल उस समय भी कलेक्टर थे और कमेटी ने यह सारा काम मानवता की दृष्टि से किया था पर उनको यह बिल्कुल पसन्द नहीं आया और उनकी बराबर यही कोशिश रही कि यह कमेटी भंग हो जाये। किसी प्रकार की सहायता उनकी ओर से कमेटी को नहीं मिली।
स्वराज्य पार्टी द्वारा इलेक्शन की पुनः तैयारी
स्वराज्य पार्टी जिसने १९२३ में कायम होकर सारे देश में चुनाव लड़ा वह फिर तीन साल बाद १९२६ में दूसरी बार चुनाव की तैयारी करने लगी। पर अब स्वराज्य पार्टी में मतभेद हो गया था। १९२३ में पंडित मोती-लाल नेहरू सी० आर० दास, लाला लाजपतराय सब एक होकर लड़े थे। सी० आर० दास की १९२५ में मृत्यु हो चुकी थी, लाला लाजपत राय ने पंडित मदन मोहन मालवीय के साथ अलहदा पार्टी बनाने की घोषणा कर दी थी, वह स्वराज्य पार्टी से पृथक हो गये थे।
पं० मोती लाल नेहरू व ला० लाजपतराय का बदायूँ में आगमन
पंडित मोती लाल नेहरू व लाला लाजपत राय ने पृथक-पृथक रघुवीर सहाय को तार देकर यह सूचना दी कि वह प्रचारार्थ उक्त तिथियों को बदायूँ आ रहे हैं। रघुवीर सहाय ने उन दोनों महान नेताओं का, जिनका वह आदर करते थे, उक्त तिथियों पर सम्मान के साथ स्वागत किया और उनकी सभाओं का आयोजन किया। दोनों नेताओं ने अपने-अपने पक्ष के लिए वोटों की मांग की। लाला लाजपत राय के आगमन पर एक समय जब वह भोजन कर रहे थे तब रघुवीर सहाय ने प्रश्न पूछा कि क्या पंडित मोती लाल नेहरू व लाला जी के दरम्यान कोई उद्देश्यों का मतभेद है जिसके कारण वह पृथक-पृथक कैम्पों में हो गये हैं और चुनाव अलहदा-अलहदा लड़ रहे हैं। रघुवीर सहाय ने कहा कि ऐसी स्थिति में उन जैसे लोग, जो दोनों नेताओं का महान आदर करते हैं और जो संकट में पड़ गये हैं कि वह क्या करें। लाला जी ने तब डबडबाती आंखों से उनसे कहा कि उनके व पंडित मोती लाल नेहरू के दरम्यान कोई उद्देश्यों का मतभेद नहीं है न राजनैतिक मतभेद ही, पर उनके प्रति जो अपमानजनक व्यवहार पंडित मोती लाल नेहरू का रहा है सो वह अपने स्वाभिमान की रक्षा करने हेतु ऐसा करने पर मजबूर हो गये हैं। लालाजी व पंडित मोती-लाल नेहरू के आपस के वैमनस्य के कारण स्वराज्य पार्टी को बड़ी क्षति उठानी पड़ी। १९२६ के चुनाव में केन्द्रीय एसेम्बली में स्वराज्य पार्टी उतने स्थान प्राप्त नहीं कर सकी जितने उसने १९२३ में प्राप्त किये थे। बदायूँ पर भी इस विभाजन का प्रभाव पड़ा कुँवर रुकुम सिंह का समर्थन लाला लाजपत राय व पं० मदनमोहन मालवीय के साथ, और रघुवीर सहाय का समर्थन पं० मोती लाल नेहरू के साथ रहा।
सवारी गाड़ी की दुर्घटना
मार्च १९२४ में बदायूँ से जाने वाली पैसेन्जर ट्रेन, जो बरेली की ओर तीसरे पहर जा रही थी, जब राम गंगा के पुल पर पहुँची तो जोर की आँधी ने उसे घेर लिया। पुल के ऊपर केवल स्लीपरों पर पटरी पड़ी थी। सारा लम्बा पुल दोनों तरफ से नंगा था कोई जंगला या रेलिंग नहीं लगे थे। आँधी के कारण जो सवारी गाड़ी के डिब्बे पुल को पार नहीं कर पाये थे वह राम गंगा में गिर गये या लटके रहे। बाकी इन्जिन और कुछ माल गाड़ी के डिब्बे जो उसके पीछे लगे हुए थे पुल को पार कर गये। इस घटना की खबर बदायूँ रात्रि में ही पहुँच गई थी। दूसरे दिन रघुवीर सहाय घटना स्थल पर पहुँचे। राम गंगा का पुल जो बरेली साइड में था उसके समीप यह घटना हुई थी। उसी के नीचे रामगंगा बह रही थी। उस स्थान पर पहुँचने के लिए नावों का पुल पार करके लगभग दो मील सफर करने के बाद जाना पड़ा। वह दर्दनाक दृश्य रघुवीर सहाय ने अपनी आंखों से देखा। लाशें, जो पानी में से निकाल ली गई थीं, वह कतार में पड़ी हुई थीं। उनके निकट संबन्धी इस घटना की खबर पाकर वहाँ पहुँच गये थे और रोने चिल्लाने में मशगूल थे। पुल के ऊपर क्रेन के जरिये से जो डिब्बे लटके हुए थे उनको निकालने की कोशिश की जा रही थी। लगभग ५० से अधिक लोग हताहत हुए होंगे, उनमें अधिकांश बदायूँ के ही थे। पुल के पास रेलवे स्टाफ पहुँच गया था। स्टाफ का रवैया उन लोगों के साथ, जिनके अजीज हताहत हुए थे सहानुभूति पूर्ण मालूम देता था। पर यह बात पुलिस के रवैये के बारे में नहीं कही जा सकती थी। बहुतेरे लोगों के बारे में, जिनके निकट संबन्धी हताहत हो चुके थे, रघुवीर सहाय को रेलवे स्टाफ से सहायता मांगनी पड़ी, जो मिली। इस दुर्घटना का वर्णन रघुवीर सहाय ने एक लेख में समाचार पत्रों में भेजा जो २२ मार्च के ‘लीडर’ में प्रकाशित हुआ। उसी के समीप किसी तारीख में ‘अमृत बाजार पत्रिका’ कलकत्ता व ‘इन्डिपेन्डेन्स’ लखनऊ में भी प्रकाशित हुआ।
गांधी जी का दोबारा बदायूँ आगमन
गांधी जी दोबारा बदायूँ ८ नवम्बर १९२६ को पधारे। उनका यह दौरा उत्तर प्रदेश में हरिजन उद्धार के संबन्ध में था। वह हरिजनों के हित के लिए धन एकत्रित कर रहे थे। बदायूँ भी उस दौरे में शामिल कर लिया गया था और उनके आने की तिथि मुकर्रर कर दी गई। वह कासगंज की ओर से आये और उभयानी स्टेशन पर उतरे। रघुवीर सहाय उनकी अगुवाई के लिये कासगंज पहुँच गये थे। वहाँ से गांधी जी, आचार्य कृपालानी, कस्तूरबा, मिस स्लेड, महादेव भाई देसाई, प्रभावती देवी के साथ तीसरे दर्जे के डिब्बे में सफर कर उभयानी पहुँचे, जहाँ चौधरी तुलसी राम और बहुत से लोगों ने उनका स्वागत किया।
गांधी जी उभयानी में—श्री तुलसी राम का खद्दर उत्पादन केन्द्र
रेलवे स्टेशन पर रेवरेन्ड टाईटस अपनी कार लिये खड़े थे जिसमें महात्मा गांधी अपने अन्य साथियों सहित पहले चौधरी तुलसीराम खद्दर वाले के खद्दर उत्पादन केन्द्र पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने खद्दर का विशाल संग्रह देखा। यह सब देखकर वह बहुत प्रसन्न हुए। उसके बाद वह रामलीला मैदान में एक विशाल सार्वजनिक सभा में उपस्थित हुए, जहाँ म्युनिसिपल बोर्ड, कांग्रेस कमेटी पाठशाला की ओर से अभिनन्दन पत्र व चौधरी तुलसीराम ने १००१) रुपये की थैली भेंट की। संक्षिप्त भाषण देने के उपरान्त वह मोटर द्वारा बदायूँ के लिए रवाना हुए। बदायूँ उभयानी से ८ मील है। रास्ते में महात्मा जी के जलपान का समय हो जाने के कारण कार को पेड़ों के नीचे साये में रोक दिया गया। गांधी जी आसन डालकर जमीन पर ही बैठ गये और सब लोग उनके चारों तरफ खड़े हो गये। आस पास के खेतों पर काम करने वाले भी वहाँ इकट्ठा हो गये। तब रेवरेन्ड टाईटस ने अपनी हिन्दी में उन ग्रामीण लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा, “तुम लोगों को मालूम है कौन बड़ा आदमी तुम्हारे सामने बैठा है। यह महात्मा गांधी हैं”। यह शब्द सुनते ही वे ग्रामीण लोग, जो वहाँ खड़े थे, अपने अपने स्थानों से पीछे हटने लगे। मानो उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि हम इतने नजदीक गांधी जी के सामने खड़े हुए हैं।
रास्ते के दोनों ओर चौकीदार की तैनाती व बदायूँ में रायज़ादा की कोठी में गांधी जी का विश्राम
उभयानी से बदायूँ मार्ग पर दोनों ओर सरकारी बर्दियों में उस समय के चौकीदार अपनी पेटी लगाये हुए और हाथ में पीतल की मूठ लगी हुई लाठियाँ लिये हुए खड़े थे। उस समय अंग्रेज कलेक्टर व कप्तान जिले में थे। बदायूँ पहुँचने पर उनको डाक्टर रायज़ादा की कोठी में, जो शहर के बाहर थी, ले जाया गया। तुरन्त ही मुसलमान कोतवाल उनसे मिलने आये। उन्होंने दरियाफ्त किया कि क्या वह कोई सेवा कर सकते हैं। रघुवीर सहाय व दूसरे साथियों के सुभाव पर उन्होंने रात के समय कोठी की हिफाजत के लिए दो सिपाहियों को तैनात कर दिया, जिन्होंने रात भर ड्युटी दी।
पीर बख्श द्वारा गांधी जी का शेव
प्रातःकाल अगले दिन पीर बख्श नाई ने गांधी जी का आकर शेव किया और बहुत आग्रह पर भी कोई पैसा नहीं लिया।
सार्वजनिक सभा में गांधी जी का भाषण
उसके बाद महात्मा जी गुरुकुल व पार्वती कन्या पाठशाला गये जहाँ उनको मानपत्र व रुपये की थैलियाँ भेंट की गईं। छोटे-छोटे भाषणों के बाद वह सार्वजनिक सभा में आये, जहाँ एक विशाल जनसमूह उनके दर्शनों व भाषण सुनने का इन्तज़ार कर रहा था। उस समय महात्मा गांधी के साथ चौधरी तुलसी राम व रघुवीर सहाय थे। सभा स्थल पर बदायूँ म्युनिसिपल बोर्ड व डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की ओर से मानपत्र व पब्लिक की ओर से २००१) रुपये की थैली भेंट की गई। तब गांधी जी ने अपना भाषण दिया। उस समय भाषण में उन्होंने अपने १९२१ में आने का जिक्र किया। जब वह मौलाना अब्दुल माजिद बदायूनी के आग्रह पर आये थे। उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता, नशीली चीजों का बहिष्कार और हरिजनों के साथ बराबरी के बरताव पर बल दिया। खद्दर के प्रयोग के बारे में उन्होंने कहा कि विदेशी कपड़े के इस्तेमाल से जो साठ करोड़ रुपया प्रतिवर्ष दूसरे देशों को जाता है वह रोका जाय। भाषण की समाप्ति पर जो मानपत्र उनको भेंट किये गये थे वह नीलाम कर दिये गये और उनसे प्राप्त रुपया भी गांधी जी के हवाले कर दिया गया। सभा स्थल से वह सीधे रेलवे स्टेशन पहुँचे, जहाँ उन्होंने ‘जगत प्याऊ’ का निरीक्षण किया और तदोपरान्त रेल में सवार होकर बरेली चले गये।
साम्प्रदायिक एकता की कमी
यह वह समय था जब हिन्दू मुसलमानों में १९२१ जैसी एकता नहीं थी, जिसे महात्मा गांधी ने स्वयं देखा था। उन्हीं मौलाना अब्दुल माजिद बदायूनी ने, जो पहली बार गांधी जी को स्वयं अपने आग्रह पर बदायूँ लाये थे, इस बार अपने हस्ताक्षरों से पोस्टर छपवाकर तक़सीम कराये थे जिनमें उन्होंने मुसलमान पब्लिक से गांधी जी के दर्शनों को व उनकी मीटिंग में जाने को मना किया था। जब यह बात गांधी जी के नोटिस में लाई गई तो उन्होंने कहा कि वह मौलाना अब्दुल माजिद को अब भी उतना ही प्रेम व आदर करता हूँ जितना १९२१ में करता था। मौलाना अब्दुल माजिद के इश्तहारों के बावजूद मुसलमान बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
कार देने से इनकार
एक तरफ यह था तो दूसरी तरफ गांधी जी को उभयानी से बदायूँ लाने के लिए रघुवीर सहाय के उन सभी मित्रों ने, जिनके पास उस जमाने में कार थी, देने से इनकार कर दिया। एक विकट समस्या पैदा हो गई। उस जमाने में किराये की टैक्सी इत्यादि का चलन नहीं था। इने-गिने लोगों के पास जिले में कारें थीं। महात्मा गांधी को उभयानी से बदायूँ तक इक्के या तांगे में लाना अच्छा नहीं मालूम देता था। उस संकट के समय एक दिन अकस्मात रेवरेन्ड टाईटस, एक अमेरिकन मिशनरी जो बदायूँ में उन दिनों रहते थे, रघुवीर सहाय के पास पहुँचे और उनसे कहा कि क्या कोई सेवा उनके लायक है। रघुवीर सहाय ने तुरन्त उनसे कहा कि उनको एक कार की आवश्यकता है, जिसमें बैठाल कर महात्मा गांधी को उभयानी से बदायूँ लाया जाये। टाईटस ने फौरन उत्तर में कहा कि वह बिल्कुल नई कार महात्मा जी की सेवा में उपस्थित कर सकते हैं, पर एक शर्त पर। दरियाफ्त करने पर बताया कि शर्त यह है कि वह कार को स्वयं ड्राइव करेंगे। रघुवीर सहाय ने इस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया और वह बराबर कार को ड्राइव करते रहे। हाँ उन्होंने उसके एवज़ में गांधी जी को कुछ मिनटों के लिए ‘सिंगलर गर्ल्स स्कूल’ में जाने को तैयार कर लिया जो पहले से प्रोग्राम में शामिल नहीं था। गांधी जी का बदायूँ का वह दौरा अत्यन्त सफल रहा और जनता पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा।
उ० प्र० कौन्सिल में बदायूँ जिले के हित के लिए रघुवीर सहाय द्वारा कार्य
उत्तर प्रदेश कौन्सिल में स्वराज्य पार्टी के सदस्य के रूप में रघुवीर सहाय १९२७ से १९२९ तक रहे। इस बीच उन्होंने बदायूँ जिले के हित के लिए हरी बाबा द्वारा स्वामी बांध, जो गंगा नदी के किनारे कई मील लम्बाई में बनवाया गया है और स्वामी बांध के नाम से मशहूर है, उसकी रक्षा व देखभाल के लिए उत्तर प्रदेश सरकार से १०००) रुपये सलाना की धनराशि मन्जूर कराई। उन्होंने कौन्सिल का इस ओर भी ध्यान दिलाया कि परगनाधीशों के पास से माल का काम निकालकर उस काम के लिए अतिरिक्त अफसर नियुक्त किये जायें। यह सिद्धान्त रूप में सरकार ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने सरकार का इस ओर भी ध्यान दिलाया कि जो आनरेरी मुन्सिफ या मजिस्ट्रेटों की अदालतें उनके निजी स्थानों पर हुआ करती है वह वहाँ से अलहदा की जाये और पब्लिक स्थानों पर ही रखी जाये।
उ० प्र० कौन्सिल का नैनीताल का सेशन
१९२९ के प्रारम्भ में जब उत्तर प्रदेश विधान सभा के स्वराज्य पार्टी के सदस्य नैनीताल में होने वाले सेशन के लिए वहाँ पहुँचे तब पंडित मोती लाल नेहरू, जो स्वराज्य पार्टी के अध्यक्ष थे, उनकी ओर से एक आदेश इस आशय का पहुँचा कि कोई भी सदस्य कौन्सिल की मीटिंग में भाग न ले। इस पर सभी सदस्यों को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने पंडित गोविन्द बल्लभ पंत जी से, जो स्वराज्य पार्टी के नेता थे, कहा कि वह पंडित जी को तार द्वारा लिखें कि नैनीताल सेशन में भाग लेने की स्वीकृति प्रदान की जाये क्योंकि इस सेशन में जो बिल इत्यादि विचाराधीन थे वह मुख्यतया स्वराज्य पार्टी के सदस्यों द्वारा ही पेश किये गये थे और उनकी दूसरी या तीसरी रीडिंग थी। पर पंडित मोती लाल ने यह बात नहीं मानी और अपने पूर्व आदेश कायम रखे। सभी सदस्यों को, जिनमें पंत जी भी शामिल थे, बुरा लगा। पंडित जी ने ऐसे आदेश प्रत्येक प्रदेश की स्वराज्य पार्टी को भेज दिये थे।
समाचार पत्रों द्वारा आदेशों पर टिप्पणी
नैनीताल से वापस आने के पश्चात रघुवीर सहाय के, जो सदस्यों की राय से परिचित थे, अनेक लेख इलाहाबाद के ‘लीडर’ में प्रकाशित हुए। जिनमें इन आदेशों की कड़ी आलोचना की गई थी। वह एक देश व्यापी प्रश्न बन चुका था और इस कारण इलाहाबाद में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी व वर्किंग कमेटी के अधिवेशन बुलाये गये। रघुवीर सहाय उस समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी व आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे। इसीलिए वह भी इलाहाबाद गये। उन्होंने वहाँ देखा कि पंडित मोती लाल नेहरू उनके लेखों के प्रकाशित होने पर बहुत रुष्ट हैं। पंत जी ने उन्हें व बिजनौर के श्री नेमी शरण जैन को उत्तर प्रदेश स्वराज्य पार्टी की ओर से प्रतिनिधित्व करने के लिए वर्किंग कमेटी के सामने मनोनीत किया। वर्किंग कमेटी के समक्ष सभी प्रान्तों की ओर से प्रतिनिधि के रूप में स्वराज्य पार्टी के सदस्य आये थे। सबों ने अपने-अपने विचार प्रकट किये। रघुवीर सहाय व नेमी शरण ने भी। अन्त में इन सब सदस्यों ने पंडित मोती लाल नेहरू के आदेशों का समर्थन नहीं किया। किसी भी सदस्य ने आपकी बात का समर्थन नहीं किया। इसके पश्चात गांधी जी ने, जो बराबर सारी बहस को बड़े ध्यान से वहाँ से सुन रहे थे, पंडित मोती लाल नेहरू से प्रश्न किया कि स्वराज पार्टी कहाँ है? इसके पश्चात गांधी जी ने उन्हें परामर्श दिया कि वह अपने आदेशों को वापस ले लें और स्वंय आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी के सम्मुख ऐसा प्रस्ताव पेश करें। वैसा ही हुआ। अगले दिन इलाहाबाद के म्योहाल में जब अखिल भारतीय अधिवेशन प्रारम्भ हुआ तो पंडित मोती लाल नेहरू ने प्रस्ताव पेश करके अपने पिछले आदेशों को वापस ले लिया और यह निश्चय हुआ कि यह प्रश्न लाहौर कांग्रेस तक, जो आगामी दिसम्बर में होने जा रही है, मुल्तवी रखा जाये।
लाहौर का कांग्रेस अधिवेशन
पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन बड़ी धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। रघुवीर सहाय भी बदायूँ से उसमें भाग लेने पहुँचे। इससे पहले कोकोनाडा (१९२३) व गौहाटी (१९२६) के अधिवेशनों को छोड़कर वह सभी अधिवेशनों में शामिल हो चुके थे। नेहरू रिपोर्ट, जो कलकत्ता अधिवेशन १९२८ में पास हो चुकी थी और जिसके अनुसार कांग्रेस का ध्येय ‘औपनिवेशक स्वराज्य’ १९२९ के अन्त तक रहेगा। यदि उस नियत समय तक औपनिवेशक स्वराज्य प्राप्त न हो सके तो ध्येय ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ प्राप्त करना हो जायगा। वर्ष के अन्त तक ऐसा नहीं हुआ। तदनुसार ३१ दिसम्बर, ’२९ को आधी रात के समय कांग्रेस का राष्ट्रीय ध्वज जय-जयकारों की गड़गड़ाहट में बड़े उल्लास के साथ फहराया गया और पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने का ध्येय घोषित किया गया।
सिविल नाफ़रमानी के पुनः आरम्भ करने की तैयारियाँ
इसी अधिवेशन में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सिविल नाफ़रमानी आन्दोलन को पुनः आरम्भ करने का प्रस्ताव पारित हुआ। यह भी निश्चय हुआ कि जो लोग इस समय केन्द्रीय एसेम्बली व प्रदेश विधान सभाओं में स्वराज्य पार्टी के टिकट पर सदस्य हैं वे अपने स्थानों से तुरन्त त्याग-पत्र दे दें। लाहौर से वापस आने के तुरन्त बाद रघुवीर सहाय ने उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्यता से त्याग-पत्र दे दिया और अगले सिविल नाफ़रमानी आन्दोलन में भाग लेने की तैयारी करने लगे।