अध्याय 4 / 11
नमक सत्याग्रह
1930–33
यह पुस्तक १९७४ में हिंदी में लिखी गई थी और यहाँ ठीक वैसे ही प्रस्तुत है जैसे प्रकाशित हुई थी — इसका अनुवाद नहीं किया गया है। मेनू व नेविगेशन भाषा बदलते हैं; पुस्तक का पाठ नहीं बदलता।
२६ जनवरी, १९३० पूर्ण स्वराज्य दिवस
१९३० के आरम्भ से ही एक नई फिजा समूचे देश में प्रतीत होने लगी। बदायूँ भी इससे वंचित नहीं रह सका। वातावरण में “पूर्ण स्वतंत्रता” का नारा गूँजने लगा। कांग्रेस कार्य-कारिणी के निश्चय के अनुसार सारे देश में २६ जनवरी, १९३० पूर्ण स्वराज्य दिवस के रूप में मनाया गया। तदनुसार बदायूँ में भी एक विराट सभा की गई जिसमें रघुवीर सहाय ने वह घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया जो वर्किंग कमेटी द्वारा तैयार किया गया था। घोषणा पत्र में कहा गया था :—
घोषणा-पत्र
“हम भारतीय प्रजा जन भी अन्य राष्ट्रों की भाँति अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानते हैं कि हम स्वतंत्र होकर रहें। अपने परिश्रम का फल हम स्वयं भोगें और हमें जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक सुविधा प्राप्त हो, जिससे हमें विकास का पूरा मौका मिले। हम यह भी मानते हैं कि यदि कोई सरकार वे अधिकार छीन लेती है और प्रजा को सताती है तो प्रजा को उस सरकार को बदलने का या मिटा देने का अधिकार भी है। अंग्रेज सरकार ने भारत-वासियों की स्वतंत्रता का ही अपहरण नहीं किया है बल्कि उसका आधार भी गरीबों के रक्त-शोषण पर है और उसने आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भारत-वर्ष का नाश कर दिया है, अतः हमारा विश्वास है कि भारत वर्ष को अंग्रेजों से सम्बंध विच्छेद करके पूर्ण स्वराज्य या स्वाधीनता प्राप्त कर लेनी चाहिये।”
इस घोषणा-पत्र के सुनाने के पश्चात श्रोताओं के हाथ उठवाकर सम्मति ली गई और तालियों की गड़गड़ाहट में सबने अपनी सम्मति प्रदान की।
गांधी जी का वायसराय के नाम पत्र
देश भर में नमक कानून भंग करने की बात चल पड़ी थी पर किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि किस प्रकार यह कानून भंग किया जायगा। सब अपनी अपनी अटकलें लगा रहे थे। यहाँ तक कि पंडित मोती लाल नेहरू जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ, महात्मा गांधी से स्वयं बातचीत करने के पश्चात भी सन्तुष्ट न हो पाये थे। हो सकता है महात्मा गांधी स्वयं पहले से यह सब बातें नहीं बता सकते थे कि सत्याग्रह किस प्रकार आरम्भ होगा और उसकी प्रगति में कौन-कौन से कदम उठाने पड़ेंगें। इससे पूर्व कि गांधी जी कोई कदम उठायें, उन्होंने सदा की भाँति २ मार्च १९३० को लार्ड इरविन (वायसराय) के नाम “अन्तिम चेतावनी” के रूप में एक चिट्ठी लिखी, जिसको उन्होंने एक अंग्रेज युवक रेजीनाल्ड रोनाल्ड के हाथ वायसराय को भेजा। उसमें उन्होने बताया “इन बुराइयों का उपाय आप नहीं कर सकेंगे और मेरे पत्र का आपके ऊपर असर नहीं होगा तो मैं ११ मार्च, १९३० को उपलब्ध साथी लेकर नमक कानून तोड़ने के लिए चल पड़ूँगा। गरीबों की दृष्टि से मैं इस कानून को सबसे अधिक अन्याय पूर्ण समझता हूँ।’
डांडी यात्रा का आरम्भ
अपने निश्चय के अनुसार १२ मार्च, १९३० को आश्रम के ७९ साथियों सहित गांधी जी ने अपनी डांडी यात्रा¹ आरम्भ कर दी। हजारों की संख्या में स्त्री पुरुष आश्रम से रवाना होते समय वहाँ उपस्थित थे जो उनके साथ-साथ बहुत दूर तक गये। डांडी ग्राम आश्रम से समुद्र तट २०० मील के फासले पर था। वहाँ पहुँचने में गाँधी जी को २५ दिन लगे।
१. इस यात्रा में बदायूँ जिले के मुंशी लाल नि० ग्राम बुटला भी शामिल थे, जो उन दिनों आश्रम में ही रहते थे। डांडी में गैर कानूनी नमक बनाने के बाद वह ५ दिन गांधी जी के साथ और रहकर उनकी आज्ञा प्राप्त कर बदायूँ वापस आ गये। यहां आकर पिकेटिंग इत्यादि में भाग लिया पर उनकी गिरफ्तारी सन् १९३२ में हुई और जेल गये। जेल से छूटने के पश्चात वह गांधी आश्रम मेरठ चले गये।
स्त्रियों व ग्रामीण जनता का आन्दोलन में भाग
यह समाचार बिजली की तरह देश के कोने कोने में फैल गये और जिस तरह गांधी जी धीरे-धीरे आगे बढ़ते जाते थे, एक प्रकार की आग जैसी-लगती जाती थी जिसका प्रकाश चारों ओर फैलता जाता था। हर दिशा व हर स्थान पर नमक सत्याग्रह की बात कान में सुनाई देने लगी। गांधी जी ने अपनी यात्रा के दौरान स्त्रियों से भी इस यज्ञ में भाग लेने के लिए अनुरोध किया। जिन गांवों से होकर वे गुजरते थे, वहाँ के सब पटेल इत्यादि अपने इस्तीफा देते जाते थे।
नमक सत्याग्रह में पुरुषों के अलावा स्त्रियों व ग्रामीण लोगों ने अधिक संख्या में भाग लिया। १९२१ के असहयोग आन्दोलन में स्त्री व ग्रामीण इतनी अधिक संख्या में भाग लेने नहीं आये थे।
गुलड़िया गांव नमक सत्याग्रह के लिए
बदायूँ में भी चारों ओर स्थान-स्थान पर नमक कानून भंग करने की चर्चा चलने लगी। रघुवीर सहाय अपने अनेक साथियों सहित विशेष कर चौधरी तुलसी राम यह विचार करने लगे कि जिले में नमक कानून किस स्थान पर और किस तिथि को भंग किया जाये। अनेक भागों में जिले के अन्दर घूमकर वह और उनके साथी इस नतीजे पर पहुँचे कि नमक सत्याग्रह गुलड़िया गांव, जो बदायूँ शहर से लगभग सात मील दातागंज वाली सड़क पर है, से आरम्भ किया जाये।
रुहेलखण्ड के प्रत्येक जिले ने भाग लिया
इसी निश्चय के अनुसार उन्होंने रुहेलखण्ड डिवीजन की सभी जिला कांग्रेस कमेटियों को यह सूचना दे दी और उनसे प्रार्थना की कि वह सब अपने-अपने जिलों से कांग्रेस जनों की टुकड़ियाँ भेज नमक कानून को गुलड़िया में भंग करें। बरेली, मुरादाबाद, पीलीभीत, शाहजहाँपुर, बिजनौर सभी जिले इस पर राजी हो गये और अपने-अपने जिलों से सत्याग्रहियों को भेजना आरम्भ कर दिया।
सार्वजनिक सभाओं की आवश्यकता नहीं हुई
गुलड़िया ग्राम में नमक कानून भंग किये जाने की खबर सारे जिले में बिजली की तरह फैल गई। इस सत्याग्रह के सम्बंध में शहर व जिले में आम सभायें जैसा कि १९२१ के सत्याग्रह के सिलसिले में की गई थीं वह नहीं करनी पड़ी। बात फैल चुकी थी और हर स्थान पर लोग नमक कानून भंग करने के लिए तैयार थे।
लक्ष्मण दत्त का बदायूँ पहुँचकर सत्याग्रह में भाग लेना और पृथ्वीराज सिंह व दामोदर स्वरूप सेठ का जत्थों के साथ आना
जब गुलड़िया में नमक कानून भंग करने की खबर श्री लक्ष्मण दत्त को, जो उस समय काशी विद्यापीठ में थे, हुई तो वह विद्यापीठ बन्द हो जाने पर सीधे बदायूँ आये और सत्याग्रह में भाग लेने के लिए रवाना हो गये। उधर बरेली से ठाकुर पृथ्वी राज सिंह, जो पहले बदायूँ में डिप्टी कलेक्टर रह चुके थे और यहीं से इस्तीफा देकर बुधौली जिला बरेली अपने निवास स्थान चले गये थे, अपनी पत्नी सहित व सेठ दामोदर स्वरूप अपने साथियों सहित बदायूँ पहुँचे। रास्ते में बरेली से आने वालों को जो पैदल यात्रा करते हुए आ रहे थे, बड़े कष्ट सहन करने पड़े। उनको अनेक स्थानों पर गुन्डों ने, जो लाठियाँ लिये हुए थे, घेर लिया और आगे बढ़ने से रोका, पर सब आपत्तियों को सहन कर वह बदायूँ पहुँचे, जहाँ उनका हार्दिक स्वागत किया गया। बदायूँ में थोड़े समय रुकने के बाद वह गुलड़िया के लिए रवाना हुए, जहाँ पहुँचने पर उनको फूल मालायें पहिनाई गईं और उन सबको एक विशेष स्थान पर ठहराया गया।
गुलड़िया में नमक बनाने का कार्य आरम्भ
इसी प्रकार जत्थे पर जत्थे अनेक जिलों से बदायूँ होकर गुलड़िया पहुँचने लगे। गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी हो गया। गुलड़िया में इस ऐतिहासिक कार्य के लिए वहाँ की जनता ने विशेष प्रबन्ध किये थे। गांव से दक्षिण ओर, जहाँ अब बिजली की चक्की लगी है, रणवीर सिंह के खेत में नमक कानून भंग करने की व्यवस्था की गई थी। उसके चारों ओर एक बाड़ा रस्सियों से घेरकर बनाया गया था। उसके अन्दर क्यारी बनाकर नुनखुरी मिट्टी (माटी) जमाकर उस पर पानी छिड़क दिया गया था। पानी रस-रस कर नीचे नाली द्वारा निकलता था जो बाद में जमाकर बड़े बड़े कढ़ावों में उबाला जाता था। कढ़ावों में जो पपड़ी नीचे रह जाती थी वह इकट्ठी कर ली जाती थी, वह ही नमक होता था।
कानून भंग करने के समय लगभग १०-१५ हजार स्त्री पुरुष मौजूद थे जो सारे जिले से वहाँ आकर इकट्ठा हुए थे। पुलिस वहाँ पहले से ही पहुँच गई थी।
ठा० पृथ्वी राज सिंह की गिरफ्तारी
नमक कानून भंग किये जाने से पहले ही ठाकुर पृथ्वी राज सिंह, जो गुलड़िया अपनी पत्नी व दूसरे साथियों सहित पहुँच गये थे, बदायूँ पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये। उनको वहाँ से बदायूँ जेल भेज दिया गया। उनके गिरफ्तार होने के बाद कानून भंग किया गया, और बड़े उत्साह व उल्लास के साथ नमक बनाया गया।
अनेक ज़िलों ने भी अपने-अपने जत्थे भेजे
बाहर से आने वालों को पृथक-पृथक स्थानों पर ठहराया जाता और उनके खाने पीने की उचित व्यवस्था की जाती थी। नेताओं में, जो बाहर से आये थे, केवल ठाकुर पृथ्वी राज सिंह को ही गुलड़िया में गिरफ्तार किया गया था। अन्य सभी को बदायूँ व गुलड़िया के बीच रास्ते में ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता था। मुरादाबाद, पीलीभीत, बिजनौर, शाहजहाँपुर के भी जत्थे वहाँ पहुँचे पर गिरफ्तार नहीं किये गये। उन सब जत्थों के वापस होने पर बदायूँ से कई जत्थे बरेली इत्यादि जिलों में नमक कानून भंग करने हेतु गये जब वह वहाँ भी गिरफ्तार नहीं किये गये तो बदायूँ वापस आ गये।
नमक कानून भंग करने का समय
नमक कानून भंग करने का सिलसिला अधिक दिन नहीं चला। महात्मा गांधी ने स्वयं डांडी जाते हुए कहा था कि ६ अप्रैल से १३ अप्रैल तक देश भर में यह कानून भंग किया जाये।
अलापुर में विभूति प्रसाद द्वारा नमक कानून भंग
गुलड़िया के अलावा अलापुर में थाने के अहाते के सामने पंडित विभूति प्रसाद ने नमक कानून को भंग किया। तभी पुलिस के सिपाहियों ने उबलते हुए पानी की कड़ाही उनके ऊपर उलट दी, जिसके फलस्वरूप उनके हाथ पैर बुरी तरह भुलस गये। ऐसी अवस्था में वह इलाज के लिये बदायूँ लाये गये जहाँ कांग्रेस के कैम्प में रखकर उनका इलाज कराया गया। यह जले हुए निशान जीवन पर्यन्त रहे।
पिकेटिंग करने वालों में स्त्रियाँ भी शामिल
नमक कानून भंग होने के समय गुलड़िया गांव में जिले के अन्य स्थानों से भी कार्यकर्ता पहुँच गये थे जिन्होंने बाद को टोलियाँ बनाकर भिन्न-भिन्न तहसीलों के सदर मुक़ामों पर पहुँच विदेशी कपड़े की दुकानों का पिकेटिंग शुरू कर दिया। इन टोलियों में स्त्रियाँ भी थीं। प्यारेलाल भंडारी की स्त्री, मुं० हेतराम की स्त्री, प० कुलानन्द की स्त्री व बाबू ताराचन्द वकील की स्त्री इनमें शामिल थीं।
हर प्रसाद की धर्मशाला व पुरानी तहसील में वालिन्टियर्स कैम्प की स्थापना
नमक कानून भंग होने के उपरान्त जिले भर के वालिन्टियर्स बदायूँ शहर में आकर हर प्रसाद की धर्मशाला में, जो शहर के उत्तर तरफ बदायूँ-बरेली सड़क पर है, इकठ्ठे हुए और वहाँ १५-२० दिन तक रहने के पश्चात पुरानी तहसील के एक बड़े मकान में लाये गये जहाँ एक मुस्तकिल कैम्प कायम कर दिया गया। उस समय प्यारे लाल भंडारी, किशोरी लाल वियोगी, मास्टर जंग बहादुर, जै-गोपाल रस्तोगी, शिव चरन लाल, ध्रुव दत्त, सोहन लाल, बाबू राम, महाशय उमराय लाल, गंगाराम, हरशरण वर्मा, आदि कैम्प की देखभाल करते थे और वालिन्टियर्स को पिकेटिंग के लिए जिले के अन्य स्थानों पर और शहर के अन्दर भेजते थे।
कैम्प के खर्च के लिए धन संग्रह—व्यक्तिगत दान
कैम्प के खर्च के लिए धन व अन्य सामग्री शहर के लोगों से मुख्यतः दया शंकर वकील द्वारा एकठ्ठी की जाती थी। महाशय करन सिंह भी इस कार्य में सहायता देते थे। उस समय शहर के लोगों में अपूर्व उत्साह था। धन तथा सामग्री सहर्ष देते थे। लाला पहलादी लाल, जो उस समय बदायूँ के सबसे प्रतिष्ठित धनाढ्य थे, कांग्रेस को प्रति मास पचास रुपये के हिसाब से दान के रूप में देते थे। उनका यह दान कांग्रेस सत्याग्रह आन्दोलन के अन्त तक चलता रहा। इसी प्रकार लाला राधा कृष्ण हलवाई १० रुपये मासिक देने लगे।
पिकेटिंग के सम्बंध में गिरफ्तारियाँ
बदायूँ कैम्प से अलहदा-अलहदा वालिन्टियर्स के जत्थे दातागंज, सहसवान, बिसौली, बिलसी, गुन्नौर भेजे गये जहाँ विदेशी कपड़ों की दुकानों का पिकेटिंग आरम्भ कर उनके सभी विदेशी कपड़े को सील मुहर कर दिया। अन्य जो स्वदेशी कपड़ा उनके यहाँ था, उसको बेचने दिया। जब वालिन्टियर्स को यह मालूम हो जाता था कि व्यापारी ने विदेशी कपड़े की सील मुहर तोड़कर कपड़े बेचना शुरू कर दिया है तो वह उस पर जुर्माना डालते थे और उसको वसूल करते थे और फिर उन दुकानों का पिकेटिंग शुरू कर देते थे, इस सिलसिले में शासन की ओर से धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ होने लगीं। प्यारे लाल भंडारी, हेतराम सिंह, मुं० मंगल सेन, बादाम सिंह इत्यादि दातागंज से गिरफ्तार कर बदायूँ जेल भेज दिये गये। मुन्शी टीका राम गुलड़िया वालों की गिरफ्तारी बदायूँ में ही हुई। गुराई के श्याम सिंह, व उमराय सिंह चन्दऊ के जमादार सिंह, शेगर के वीरेन्द्र सिंह भी गिरफ्तार कर लिये गये। सोहन सिंह, प्यारे सिंह, बुलाकी सिंह, विमल सिंह, हर प्रसाद सिंह, आम गांव के व जीराज सिंह, जरीफनगर के व कल्यानपुरी भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये।
रघुवीर सहाय की गिरफ्तारी व अन्य गिरफ्तारियाँ
रघुवीर सहाय को २७ अप्रैल को बदायूँ से गुलड़िया जाते समय रास्ते में ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इसी प्रकार बदायूँ के अनेक कार्यकर्ता, मास्टर जंग बहादुर, जैगोपाल रस्तोगी, हर शरण वर्मा, मास्टर बालमुकन्द सहाय, महाश्य उमराय लाल, सोहन लाल, गंगाराम, कुवँर रुकुम सिंह व चौधरी तुलसी राम आदि को गिरफ्तार कर उनको सजायें दे दी गईं और मुखतलिफ जेलों को भेज दिया गया। गिरफ्तारियों की सारे जिले में घूम मच गई। नरायन सहाय जौहरी बिसौली, मुन्शी सोहन लाल सैदपुर, कृष्ण स्वरूप विद्यालंकार इस्लामनगर आदि को भी गिरफ्तार कर और मुकदमा कायम कर सजा सुनाते के पश्चात प्रान्त के अन्य जेलों को भेज दिया गया।
मुकदमा और सज़ायें
रघुवीर सहाय के मुकदमे की सुनवाई जेल के अन्दर ही हुई और उन्हें धारा १-सी साल्ट एक्ट १८८२ के अन्तर्गत ३० अप्रैल १९३० को ६ मास की कड़ी कैद व १०० रु० जुर्माना की सजा दे दी गई। बाद को वह सीतापुर डिस्ट्रिक्ट जेल भेज दिये गये जहाँ से वह ८ अक्तूबर, १९३० को रिहा होने के बाद लौटे।
राजनैतिक बन्दियों के प्रति जेल में व्यवहार—रघुवीर सहाय का समाचार-पत्रों में लेख प्रकाशित
सीतापुर जेल से वापस आने पर रघुवीर सहाय ने एक लम्बा लेख अनेक अंग्रेजी समाचार पत्रों में प्रकाशन हेतु भेजा जो ‘लीडर’ इलाहाबाद, ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ देहली, ‘अमृत बाजार पत्रिका’ कलकत्ता में १३ व १४ अक्तूबर १९३० को प्रकाशित हुआ। इस लेख में उन्होंने मुख्यतः सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया था कि अधिकांश सत्याग्रहियों को ‘सी’ क्लास बन्दी ही बनाकर रखा गया है जो किसी प्रकार उचित नहीं था। उनको दूसरे मामूली बन्दियों के साथ रखा जाता है जो फौजदारी इत्यादि की धाराओं के अन्तर्गत जेल भेजे जाते हैं। खाने, पोशाक, मशक्कत इत्यादि में भी उनके साथ मामूली कैदी जैसा व्यवहार किया जाता है, उनको राजनैतिक बन्दी नहीं माना जाता और यदि माना भी जाता हो तो वैसा व्यवहार नहीं किया जाता। बदायूँ जिले के अधिकांश व्यक्ति ‘सी’ क्लास में ही रखे गये हैं जैसे चौधरी तुलसी राम, कु० रुकुम सिंह, चौ० बदन सिंह, हरशरण वर्मा मास्टर, जंग बहादुर इत्यादि। बाद को उसमें से इने गिने लोगों को ‘बी’ क्लास दे दिया गया था। बरेली के सेठ दामोदर स्वरूप भी ‘सी’ क्लास में रखे गये थे। सरकार का यह रवैय्या किसी प्रकार उचित नहीं था। उन्होंने उस समय उत्तर प्रदेश सरकार के होम मेम्बर नवाब छतारी से भी इस सम्बंध में पत्र-व्यवहार किया था।
रघुवीर सहाय पुनः गिरफ्तार कर लिये गये
सीतापुर जेल से आने के पश्चात एक दिन पुलिस अधिकारी रघुवीर सहाय के पास गये और उनसे कहा कि जिलाधीश पन्नालाल ने यह कहा है कि रघुवीर सहाय की धर्मपत्नी, जो उस समय बीमार थीं, वह उनकी देखभाल करें और इस समय सत्याग्रह आन्दोलन में भाग न लें, तब रघुवीर सहाय ने उनसे कहा कि वह इस समय महात्मा गांधी व पं० जवाहर लाल नेहरू के आदेशों का पालन कर रहे हैं किसी दूसरे के आदेशों को मानने के लिये तैयार नहीं हैं। अधिकारी ने शायद यह बात जिलाधीश महोदय को बता दी। कुछ ही दिन बाद एक रोज रघुवीर सहाय कांग्रेस दफ्तर में अपने सहयोगियों से बातचीत कर रहे थे तो वहाँ कोतवाल शहर आ गये और उनको इशारे से कहा कि वह गिरफ्तार कर लिये गये हैं। उस समय तक रघुवीर सहाय ने आन्दोलन में किसी प्रकार का भाग नहीं लिया था। दफ्तर कांग्रेस से ही वह जेल पहुँचा दिये गये।
अदालत में मुकदमे की सुनवाई और मिथ्या शहादतों का पेश करना
कई दिन इन्तजार के बाद उनको मजिस्ट्रेट के सामने जेल में ही पेश किया गया। उनके खिलाफ गवाह पर गवाह इस आरोप के सिलसिले में गुजारे गये कि वह अमुक तिथि को शहर के अन्दर अमुक कपड़ा बेचने वाले की दुकान पर धरना दे रहे थे और खरीदारों को कपड़ा खरीदने से रोकते थे। जिसके कारण शान्ति व्यवस्था में गड़बड़ी होने की आशंका थी। यह जानते हुए भी कि गवाह सरासर झूठ बोल रहे हैं और जो आरोप उनके खिलाफ लगाया गया है वह मिथ्या है, उन्होंने किसी प्रकार का भाग मुकदमे में नहीं लिया। अन्त में एक आई० सी० एस० मजिस्ट्रेट ने उनको धारा ४ आर्डिनेन्स नं० ५, नं० ३० के अधीन ६ मास कैद सख्त की सजा सुना दी।
जिलाधीश महोदय की ओर से धार्मिक पुस्तकें पढ़ने का आग्रह
अगले दिन जिलाधीश महोदय स्वयं जेल में आये और रघुवीर सहाय के पास जाकर दरयाफ्त किया कि वह उनकी क्या सेवा कर सकते हैं। तब रघुवीर सहाय ने कहा कि उन्हें पढ़ने के लिये कुछ पुस्तकें चाहियें। जिलाधीश महोदय ने इसके उत्तर में कहा कि वह धार्मिक पुस्तकें पढ़ सकते हैं, राजनैतिक नहीं। रघुवीर सहाय ने उन्हें बताया कि उनकी रुचि धार्मिक पुस्तकों के पढ़ने में नहीं है। इसके बावजूद जिलाधीश ने जो स्वयं पुस्तकों का अध्ययन करते थे, उनके लिये स्वामी विवेकानन्द, चैतन्य महाप्रभु, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर इत्यादि संत महात्माओं के जीवन चरित्र व उनकी लिखी हुई पुस्तकें भेज दीं, जिनको मजबूरन रघुवीर सहाय को पढ़ना पड़ा। इस बात चीत के कुछ दिनों बाद उनका तबादला गोंडा जेल को कर दिया गया। वहाँ पर पहुँचने पर जेल के सुपरिन्टेन्डैन्ट श्री श्याम मनोहर लाल उनसे अगले दिन मिले तो उन्होंने दरयापत किया कि वह किस प्रकार की पुस्तकें पढ़ना चाहते हैं। रघुवीर सहाय ने तब बदायूँ जेल का जिक्र करते हुए बताया कि वहाँ के जिलाधीश राजनैतिक पुस्तकें पढ़ने की इजाजत नहीं देते थे, इसलिये उनको धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करना पड़ा। इस पर सुपरिन्टेन्डेन्ट महोदय ने कहा कि वह हर प्रकार की राजनैतिक पुस्तकें जेल में रह कर पढ़ सकेंगे। यहाँ तक कि बम बनाने की पुस्तकें भी, पर वह उनको बम बनाने की सामग्री उपलब्ध नहीं होने देंगे।
गोंडा जेल के साथी मौलाना अबुल कलाम आजाद
गोंडा जेल में उनके साथ अधिकांश ‘ए’ क्लास राजनैतिक बन्दी रहते थे। बाद को मौलाना अबुल कलाम आजाद भी वहाँ भेज दिये गये जो कई महीने तक उसी बैरक में रहे, जिसमें रघुवीर सहाय थे। मौलाना के रहन-सहन, बातचीत, उनकी अहिंसा में आस्था व उनकी योग्यता का परिचय उनके साथियों को मिला।
पंडित मोती लाल नेहरू का निधन
गोंडा जेल से रिहा होने के पश्चात वह सीधे बदायूँ आये तब तक पंडित मोती लाल नेहरू का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो चुका था और प्रथम गोल मेज कानफ्रेंस लन्दन में समाप्त हो चुकी थी, जिसमें वहाँ के प्राइम मिनिस्टर रेम्जे मैकडोनेल्ड ने कांग्रेस के नेताओं से अपील की थी कि वह द्वितीय गोल मेज कानफ्रेन्स में अवश्य भाग लें।
गांधी-इरविन समझौता सम्बंध में प्रचार कार्य
गांधी-इरविन समझौते के उपरान्त सिविल नाफरमानी का आन्दोलन बन्द कर दिया गया, यह कोई सन्तोष जनक समझौता न था। फिर भी इस समझौते में गांधी जी की कई बातें मान ली गई थीं, जैसे गरीब लोग अपनी जरूरत पूरी करने के लिए नमक बना सकते हैं, व्यापार के लिए नहीं। विदेशी कपड़े व नशीली चीजों के बहिष्कार के सम्बंध में प्रचार जारी रखा जायेगा। रघुवीर सहाय व उनके अन्य साथियों के जेल से रिहा होने के पश्चात यह निश्चय किया गया कि सारे जिले में समझौते के मुख्य-मुख्य अंग लोगों को जाकर बताये जायें और इसके लिए आम सभाओं का आयोजन किया जाये। तदनुसार रघुवीर सहाय ने जिले के उत्तर-पश्चिम भाग व मुन्शी टीका राम ने जो जिला कांग्रेस कमेटी के मन्त्री थे उन्होंने जिले के दक्षिण भाग में जाकर प्रचार कार्य प्रारम्भ कर दिया।
कराची कांग्रेस अधिवेशन
इससे पूर्व कि वह जिले का दौरा शुरू करें, रघुवीर सहाय कराची कांग्रेस अधिवेशन, जो मार्च १९३१ में गांधी इरविन समझौता के तुरन्त बाद हुआ, में शामिल होने गये। वहाँ एक मात्र गांधी जी को दूसरी गोल मेज कानफ्रेन्स के लिये कांग्रेस का प्रतिनिधि चुना गया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ‘यदि पंडित मोती लाल जीवित होते तो मैं उन्हें अवश्य अपने साथ लन्दन ले जाता, पर अब तो मैं अकेला ही जाऊँगा।
सांड के आक्रमण से आसफपुर की आम-सभा तितर बितर
कराची से वापस आने पर रघुवीर सहाय ने तुरन्त जिले का दौरा शुरू कर दिया और स्थान-स्थान पर जाकर गांधी-इरविन समझौते की मुख्य बातों की ओर लोगों का ध्यान दिलाया। इसी सिलसिले में जब वह एक दिन आसफपुर पहुँचे तो रात्रि के वक्त जिस समय वह पंडित त्रिवेनी सहाय के मकान के सामने रास्ते में एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे, तब एक और से गांव का सांड बैठे हुए लोगों की भीड़ को चीरता हुआ तेजी से आगे बढ़ता आ रहा था, यहाँ तक कि वह मेज और कुर्सियाँ जिसके पीछे खड़े होकर रघुवीर सहाय बोल रहे थे, वहाँ पहुँच कर आगे की ओर बढ़ा। मेज कुर्सी दोनों ही उलट पड़ीं और रघुवीर सहाय १० या १२ कदम के फासले पर जाकर गिर पड़े। सभा तितर बितर हो गई और चारों ओर चिल-पुकार मच गई। जब उनको उठाकर दूसरे स्थान पर लाया गया तब मालूम हुआ कि सांड का सींग उनके कमर के नीचे के भाग में लगा है। वह अगले दिन बदायूँ वापस आ गये, जहाँ अस्पताल में उनका आपरेशन हुआ, स्वस्थ होने में काफी समय लग गया।
मुं० टीकाराम एक्साइज ऐक्ट के मुकदमे में दण्डित पर अपील से बरी हुए
उधर मुन्शी टीका राम अपने प्रचार के कार्य में आगे बढ़ते जा रहे थे। सी० आई० डी० की रिपोर्ट के अनुसार एक स्थान पर उन्होंने कहा कि :—
“भाइयों शराब पीना बुरा है। उसे मत पियो और यदि पियो तो अपनी खींच कर पियो।”
जब वह वापस आये तो एक्साइज ऐक्ट के अधीन उन पर मुकदमा चलाया गया और अलाउद्दीन, मजिस्ट्रेट दर्जा अव्वल के इजलास से उन्हें ६ महीने की सख्त सजा व २०० रु० जुर्माना का दण्ड दिया गया। पर अपील में सेशन जज ने उन्हें बरी कर दिया। जज ने अपनी तजवीज में लिखा कि जि० कां० कमेटी का जनरल सेक्रेटरी पब्लिक में ऐसा भाषण कभी नहीं दे सकता कि शराब अपनी खेंच कर पियो।
रघुवीर सहाय अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के इलाहाबाद कार्यालय में
१९३१ में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने रघुवीर सहाय को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कार्यालय में काम करने के लिए इलाहाबाद बुला लिया। वहाँ वह स्वराज भवन में रहते थे और १९३० के आन्दोलन के विषय में रिपोर्ट तैयार करने लगे। देश के विभिन्न प्रान्तों से इस सम्बंध में वे रिपोर्ट मंगाकर रंजीत पंडित की देख रेख में कार्य करते रहे। रिपोर्ट के तैयार होने पर वह बदायूँ वापस आ गये।
पंडित जवाहर लाल नेहरू की लिखी प्रस्तावना
जब रघुवीर सहाय इलाहाबाद में ही थे, उस समय पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनकी पुस्तक “लाइफ़ इन ऐन इन्डियन जेल” की प्रस्तवना लिखी। जिसको बाद में इलाहाबाद ला जरनल ने प्रकाशित किया।
वातावरण में तबदीली, अधिकारियों की ओर से समझौते का विरोध
बदायूँ वापस आकर रघुवीर सहाय फिर प्रचार कार्य में लग गये। उस समय यद्यपि महात्मा गांधी के दूसरी गोल मेज कानफ्रेन्स में जाने की बात चीत चल रही थी। इरविन के स्थान पर विलिंगडन आ गये थे, पर जो वातावरण समझौता होने के उपरान्त पैदा हो गया था वह अब खत्म होता प्रतीत होने लगा। अधिकारियों की ओर से समझौते का घोर विरोध होना शुरू हो गया। जिसके फलस्वरूप कांग्रेस कार्यकर्ताओं के विरुद्ध कार्यवाहियाँ शुरू कर दी गईं, गवर्नमेन्ट ने अपनी दमन नीति फिर से चालू कर दी और गांधी जी के लन्दन से वापस आने के पहले ही पंडित जवाहर लाल नेहरू इत्यादि को गिरफ्तार कर लिया गया।
दमन नीति फिर से चालू कर दी गई
बदायूँ में भी इसी नीति का पालन किया गया जिसके फलस्वरूप रघुवीर सहाय ५ जून सन् १९३२ को गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये। बाद में धारा १७ क्रिमनल ला एमेन्डमेन्ट ऐक्ट व धारा ३ आर्डिनेन्स के अनुसार उनको एक साल की कैद सख्त व २०० रु० जुर्माने की सजा दी गई। सजा सुनाने के तुरन्त बाद वह फतेहगढ़ डिस्ट्रिक्ट जेल भेज दिये गये जहाँ से २६ जून सन् १९३३ को रिहा होकर बदायूँ पहुँचे।
कांग्रेस गैर कानूनी घोषित व पुलिस के छापे कांग्रेस दफ्तरों पर
इस बीच में कांग्रेस को गैर कानूनी संस्था घोषित कर देने के बाद पुलिस ने कांग्रेस दफ्तरों पर छापा मार सब सामान को अपने कब्जे में कर लिया। बदायूँ में भी पुलिस ने ऐसा ही किया। अब मुस्लिम लीग ने भी जगह-जगह अपने दफ्तर खोल लिये थे और कांग्रेस की मुखालिफत शुरू कर दी थी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर जो मुकदमे चलाये जाते थे उनके लिए गवाह मुस्लिम-लीग की ओर से फराहम किये जाते थे। पुलिस द्वारा जो सामान कांग्रेस दफ्तरों का जब्त किया जाता था वह मुस्लिम लीग के हाथों कौड़ियों में नीलाम कर दिया जाता था। कांग्रेस को फिर से कानूनी करार देने पर भी उस सामान को लौटाने का कोई प्रबन्ध नहीं किया गया।
रुहेलखण्ड डिवीजनल कानफ्रेन्स का रुपया बैंक में, उसके बारे में पुलिस की ओर से पूछ ताछ
रुपया पैसा जो कांग्रेस कमेटियों की ओर से बैंकों में जमा था वह भी जब्त कर लिया गया। इसी सम्बंध में एक दिन जब वह डिवीजनल कमेटी के अध्यक्ष थे और उसी हैसियत से उनके नाम ३ या ४ हजार रुपये बैंक में जमा थे, रघुवीर सहाय को बदायूँ के अंग्रेज सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस ने बुलाकर दरयापत किया कि वह धन अब कहाँ है और किसके कब्जे में है। रघुवीर सहाय ने यह तो माना कि उनके नाम रुपया जमा था पर अब कहाँ है इसके बताने से इनकार कर दिया। यह जानकारी प्राप्त होते ही कि सरकार ऐसी धनराशियाँ जब्त कर रही है, रघुवीर सहाय ने उक्त धन को बैंक से निकाल कर बैंक के डाइरेक्टर के हाथ उनके विश्वास पर सुपुर्द कर दिया। बैंक बरेली कारपोरेशन था।
उक्त धन की वापसी
कांग्रेस जब कानूनी घोषित कर दी गई तब एक दिन श्री श्रीप्रकाश ने, जो उस समय उ० प्र० कां० कमेटी के अध्यक्ष थे, रघुवीर सहाय को उक्त धन देने के लिए लिखा। वह उन्होंने तुरन्त डाइरेक्टर महोदय से प्राप्त कर उनके पास भेज दिया।
इधर रघुवीर सहाय की गिरफ्तारी के बाद शहर व जिले में गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया। जहाँ कहीं भी कांग्रेस कार्यकर्ता थे वह सब एक एक करके गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये। बाद में उनपर मुकदमे कायम कर और सजायें देकर भिन्न-भिन्न जेलों को भेज दिया गया।
जगन्नाथपुर गांव में पुलिस द्वारा गोली चलाई गई, किशन लाल की मृत्यु
ग्राम जगन्नाथपुर थाना गुन्नौर के बाजार में १६-१-३२ को लगान न देने के प्रचार करने के सम्बन्ध में पुलिस द्वारा रोके जाने पर बलवा हो गया। जिसमें पुलिस ने गोली चलाई जिसके फलस्वरूप किशनलाल पुत्र राजाराम नदरोली निवासी के गोली लगने से मृत्यु हो गई। उनके पुत्र रघुनाथ शास्त्री व यदुनाथ दोनों ही का कांग्रेस से घनिष्ठ संबन्ध रहा है।
फ़तेहगढ़ डिस्ट्रिक्ट जेल में वालेस कलेक्टर द्वारा रघुवीर सहाय का अपमान
फ़तेहगढ़ डिस्ट्रिक्ट जेल में उस समय रघुवीर सहाय के अतिरिक्त और भी ‘ए’ क्लास बन्दी भेजे गये थे। एक दिन वहाँ के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट वालेस आई० सी० एस० निरीक्षण के लिए सुपरिन्टेन्डेन्ट जेल व जेलर वार्सं के साथ ‘ए’ क्लास बन्दियों की बैरक में आये। प्रवेश करते ही उनके सामने रघुवीर सहाय अपनी सीट के बराबर खड़े हुए थे। वालेस ने उनके पास पहुँचकर अंग्रेजी लहजे में दरयापत किया ‘कोई शिकायत?’ रघुवीर सहाय ने उत्तर में कहा ‘नो कम्पलेन्ट’ तुरन्त क्रोध में भरकर, मुँह लाल कर वालेस बोले “तुम जंगली आदमी, हम तुमसे हिन्दुस्तानी में बोलता है तुम अंग्रेज़ी में जवाब देता है।” और आपे से बाहर हो गये। बैरक में सन्नाटा छा गया। बैरक के साथियों ने रघुवीर सहाय से पूछा कि वालेस के ऐसे अनुचित व्यवहार के प्रति उन्होंने कोई रोष प्रकट नहीं किया। तब उन्होंने उनको बताया कि यह रोष व क्रोध प्रकट करने की जगह नहीं है, पर मैं इस व्यवहार के विरुद्ध खामोश नहीं रहूँगा।
आई० जी० प्रिजन्स को पत्र लिखकर इस घटना की सूचना देने पर वालेस को स्वयं जेल में आकर क्षमा याचना करनी पड़ी
अगले दिन उन्होंने एक पत्र आई० जी० प्रिजन्स लखनऊ को लिखकर सुपरिन्टेन्डेन्ट जेल को जाकर दिया, जिसमें उन्होंने सारी घटना, जो पिछले दिन घटी थी, वह बयान करने के बाद आई० जी० को लिखा कि वह वालेस पर इज्जत हतक व तौहीन करने की नालिश दायर करने की इजाजत दें। वह उनसे हर्जाना तलब करेंगे और फौजदारी व दीवानी दोनों अदालतों में उनपर मुकदमा चलायेंगे। इस पत्र के भेजने के थोड़े दिन बाद फ़तेहगढ़ के एक प्रसिद्ध बैरिस्टर बृजनन्दन लाल, जो उस समय एम० एल० सी० भी थे, जेलर के साथ जेल में आये और रघुवीर सहाय से बातचीत के दौरान कहा कि वालेस साहब ने कहा है कि जो घटना उस दिन जेल में हुई, उसके लिए वह दुखित हैं अब बात खत्म कर दी जाये। रघुवीर सहाय ने तब उनको बताया कि वह इससे सन्तुष्ट नहीं हुए हैं। वालेस साहब को या तो लिखित माफी नामा मेरे पास भेजना चाहिये या स्वयं आकर वह मेरे सब साथियों के सामने क्षमा याचना करें। इस बात चीत के थोड़े समय के बाद वह स्वयं जेल आये। सभी लोग उनके साथ थे जो पहले भी उनके साथ रहे थे तब उन्होंने रघुवीर सहाय से बड़े नम्र शब्दों में क्षमा याचना की और अपने पिछले शब्दों को वापिस लिया।
नवाब छतारी व श्री चिन्तामणि व सर मेलकम हेली गवर्नर द्वारा हस्तक्षेप
वालेस के चले जाने के बाद अगले दिन फतेहगढ़ बार एसोसिएशन के प्रेसीडेन्ट रघुवीर सहाय से मिलने जेल आये और उनको कलेक्टर के माफी मागने पर बधाई दी, इस माफी के कांड में नवाब छतारी, जो उस समय उ० प्र० सरकार में होम मेम्बर थे व श्री चिन्तामणि, जो उस समय ‘लीडर’ के सम्पादक थे व उ० प्र० कौन्सिल के सदस्य भी थे, उनका भी हाथ रहा होगा क्योंकि उन दोनों ने ही उस समय के गवर्नर सर मैलकाम हेली से अनुरोध किया था कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करें।
जेल से वापसी
२६ जून १९३३ को रघुवीर सहाय अपनी पूरी सजा काटकर फतेहगढ़ से बदायूँ पहुँचे। इधर दूसरे सत्याग्रही भी, जो जेल गये थे, धीरे धीरे वापस आने लगे पर आने पर देखा कि सरकार की दमन नीति अभी भी चालू है। कांग्रेस गैर कानूनी संस्था बदस्तूर बनी थी।
प्रभुदास गांधी का ग्राम गुलड़िया में निवास
इस बीच में प्रभुदास गांधी ने बदायूँ जिले में आकर गुलड़िया में अपना आश्रम कायम कर रचनात्मक कार्य शुरू कर दिया। वह चरखे से सूत कातने व उसको बुनवाने व हरिजन बस्तियों के साफ करने के कार्यों पर विशेष ध्यान देते थे। चौधरी तुलसीराम ने इस आश्रम की ओर विशेष रूप से ध्यान देना शुरू कर दिया और समय समय पर वहाँ जाते रहे और प्रभुदास गांधी को अपना परामर्श भी देने लगे। जिले के रचनात्मक कार्य-कर्ताओं का वह अब एक केन्द्र बन गया।
चौधरी तुलसीराम को वहाँ जाने से रोकने के लिये वहाँ के सब इन्सपेक्टर महाराज सिंह ने उनके एक भाषण की रिपोर्ट तैयार कर उच्च अधिकारियों के पास भेजी जिसके फलस्वरूप उनके खिलाफ ताजीरात हिन्द के १२४ ए के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया। वह गिरफ्तार करके जेल भेज दिये गये। मुकदमे की सुनाई जेल में ही हुई और उनको एक साल की सजा दे दी गई।
गांधी आश्रम आसफपुर की स्थापना
प्रभुदास गांधी को विशेष रूप से मुं० टीकाराम, मुं० बलदेव सिंह, मुं० हेतराम, रणवीर सिंह व उनके भाई नरायन सिंह व बलराम सिंह आदि से सहयोग मिलता रहा। लगभग दो साल इस गाँव में रहने के पश्चात वह आसफपुर चले गये, जहाँ उन्होंने पं० त्रिवेनी सहाय के सहयोग से गांधी आश्रम की नींव डाली, जो अब भी उनकी देखरेख में चल रहा है, यद्यपि पं० त्रिवेनी सहाय अब हमारे बीच नहीं रहे।